मैंने नीलाम किया जीवन को ( कविता)
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मैंने नीलाम किया जीवन को/
वीरान किया नव-उपवन को/
जिसको अपने खून से सींचा था,
जो पौध अपने हाथ से रोपा था/
उसको बेच दूँगा और को कभी,
कब भला यह मैंने सोचा था/
मिलने को तुम आए निकटतर,
भावावेश में हाथ मैंने पकड़ा था/
मधुर- मादक स्पर्श से रोमांचित,
बाहों में मैंने तुमको जकड़ा था/
मैं गले लगा बैठा सिहरन को/
मैंने नीलाम किया जीवन को/
नीर भर कर नत- नयन में,
आग लगाया दिले- चमन में/
बहारों को किया चाक गरेबां,
अपनी एक तिरछी नजर से/
जाने तुम रोए क्यों थाम दामने- बहार,
छलक उठा प्यार बहा काजल जिधर से/
सामने आए तुम बार- बार मेरे,
हाँलाकि गुजरा मैं बहुत बचा के/
भ्रमर ने छोड़ दिया मधुबन को/
मैंने नीलाम किया जीवन को/
फूलों पर मधुपों का गुंजार,
बसाता था इक नया संसार/
क्षण भर का प्यार सुहृदवर!
चाहता था हृदय पागल नादान/
रहस्य बनाया तुमने छाया को,
समझ न पाया मैं तुम्हारी माया को/
नित्य को अनित्य बनाया कैसे?
अध्यात्म में लीन किया काया को/
कलेश पहुँचा पल्लवित सुमन को/
मैंने नीलाम किया जीवन को//
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दिल से दूर अपने कुछ,
अँधेरों की सियाही कर लूँ/
तुम जो आ जाओ इक
रात को ही सही, दीवाली कर लूँ//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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