चाहत ( गजल)
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हसरतो- तमन्ना मेरी बेकरार न हो/
खुदा करे तुझे किसी से प्यार न हो/
तू मेरी ही रहे और मैं तुम्हारा ही रहूँ,
तुम पर किसी को अख्तियार न हो/
जमाना रहा है हमेशा मुद्दई- ए- मुहब्बत,
बस इसरार यही है, खुद शर्मसार न हो/
हर्फे- मुहब्बत नहीं बेमानी, इतना समझ लो,
बस तुझे किसी हाल, मुझसे इंकार न हो/
बदौलते- हुस्न हमने वो जख्म खाए हैं यकीनन
खुदा करे, तुझे इसका कभी इमकान न हो/
हमने बहुत चाहा, तुझसे कह कर एक बार देखें,
हिचक गए यही सोच, लब पे तेरे अफसुर्दा अरमान न हो/
हर्ज नहीं तू मुझसे मिले और मैं तुझसे मिलूँ,
पर किसी हाल मोहतरिमों से कहीं तकरार न हो/
चमन में फूल खिले हैं रंग- बिरंगे, सतरंगे,
डरता हूँ दिल से, कहीं तेरा भी व्यापार न हो/
आहें भरता है" रतन" अक्सर तेरे लिए ही,
सोच कर ही, दुश्मनों से कहीं तुझे प्यार न हो//
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प्यार में कुछ इस तरह से
थीं बोझल पलकें,
चोट तुमसे खाई, फिर भी
नींद आ ही गई//
राजीव रत्नेश
1972 ई०
वाराणसी

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