तिफ्ले- नादां से मुलाकात ( कविता)
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एक तिफ्ले- नादां से
मुलाकात हो गई,
उनसे आँखों-आँखों में
बात हो गई/
वो थे मगरूर जवानी का
बोझ सँभालते- सँभालते,
क्या जाने दिल के चमन में,
ये कैसी बरसात हो गई?
उनके इंतजार में ही सुबह
से शाम हो गई,
एक तिफ्ले- नादां से
मुलाकात हो गई/
क्या अदा थी उनकी
क्या सदा थी उनकी,
क्या कशिश थी उनकी
क्या रजा थी उनकी/
उन्होंने सर के पल्लू को
ठीक किया नजाकत से,
हमीं से था प्यार और
हमीं से हया थी उनकी/
बिखर गए आस्मां के मोती
हसीं रात हो गई,
एक तिफ्ले- नादां से
मुलाकात हो गई/
वो थे चमकते नूर
हर अदा थी बाँकी,
लहराते थे कुन्तल
आँखें थीं कजरारी/
जवानी तिलस्म सी
लगती थी मुझको,
आँखों की राह उतर गया था
निकलने की थी लाचारी/
उनकी मीठी सदा दिल
के आर-पार हो गई,
एक तिफ्ले- नादां से
मुलाकात हो गई//
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और क्या देखता, सारे मंजर तो थे पानी में,
ख्वाबों में गुम, बेपर्दा था वो बहते पानी में/
खामोश बेजुबान मैं देखता ही रह गया उसे,
शरमा रही थी धूप, उसके चेहरे की ताबानी से//
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दिल में तेरी ही मुहब्बत अँगड़ाइयाँ लेती है,
रहे- गुमरही की मुझे सुनाई शहनाइयाँ देती हैं/
तुम पर है, राह कौन सा अखि्तयार करती हो,
देखूँ तू मुझ पर कैसी मेहरबानियाँ करती है//
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आईने में देख रहे थे,
वो चेहरा बार- बार,
आईना ताब न ला सका,
और चटक गया//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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