मेरा दिल न बहला सकोगी ( कविता)
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मेरा दिल तुम न बहला सकोगी/
ओ वफा की कसम खाने वाली/
मैं हूँ इक दीवाना, इक परदेशी,
रात को रुकता सुबह चल देता हूँ
कभी जमघट में, कभी वीरानों में,
अपना हर लम्हा बसर कर देता हूँ/
तुम तन्हाई- ए- ख्याल में न आ सकोगी/
मेरा दिल तुम न बहला सकोगी/
मैं बनजारा, तुम इक हसीं मुसव्विर,
मेरे ख्याल से तुम ज्यादा हसीं हो,
मैं कहाँ जंगली राहों का राही,
तुम कहीं दूर देश की परी हो/
तुम ठाठ छोड़ कर न आ सकोगी/
मेरा दिल तुम न बहला सकोगी/
इक दिन कर लोगी बंद किवाड़,
रात गए जब रोज देर से आऊँगा,
तब न कोई आरजू- मिन्नत सुनोगी,
भले तुझे छोड़ कर मैं चला जाऊँगा/
गुस्ताखी तुम सहन न कर सकोगी/
मेरा दिल तुम न बहला सकोगी/
मैं भी क्यूँकर तुमसे रजा माँगू,
कि तुम मेरी शादी-शुदा बन जाओ,
छोड़ कर जमाने के रस्मो-रिवाज,
तुम मेरी अहदे- वफा बन जाओ/
बन न तुम मेरी वफा सकोगी/
मेरा दिल तुम न बहला सकोगी/
तुम हो पुजारी, पाप से परहेज,
मन देखोगी नहीं, देखोगी परिवेश,
जूते पहने अंदर न आने दोगी,
भले आऊँगा सहकर धूप तेज/
मेरा पीना माफ कर न सकोगी/
मेरा दिल तुम न बहला सकोगी/
मेरी कुटिया तो होगी जंगल में,
तुम्हारा छूटेगा रोज जाना बाजार,
रोज साग-भाजी, सौदा- सुलफ लेना,
छूटेगा रोज खाना अमड़े का अचार/
मेरी तीखी कविता तुम सुन न सकोगी/
मेरा दिल तुम न बहला सकोगी/
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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