क्यूँ आज आँख फरक आई है ( कवित)
++++++++++++++++++++++++
बोलो क्यूँ आज
दाईं आँख फरक आई है?
क्या तुम आने वाली हो?
या तुम्हारी कोई सहेली
तुम्हारा खत देने को
मुझको राहों में रोकेगी?
साल बीता है हाल में
नये साल की मुबारकबाद
भी तो तुमने भेजा नहीं है/
क्या तुमने भेजा है
कोई लिफाफा मेरे नाम?
बोलो क्यूँ आज
दाईं आँख फरक आई है/
सभी तो हैं इस शहर में
मेरे सारे नाते-रिश्तेदार
दूर देश में एक रहता है
पर उससे थोड़ी मेरी
चलती है अदावत
वह तो आने वाला नहीं
फिर कौन है?
कोई शायद और नहीं
कहने को अपना/
एक तुम्हीं हो
पर तुम भी दूर नहीं
थोड़ी दूर पर तो
घर है तुम्हारा/
फिर कौन है?
आफत का मारा
जो मेरे घर को
सराय बनाना चाहता है
मेरी छोटी सी कोठरी से
मुझको भगाना चाहता है/
मैं क्या करूँ?
उस गुमनाम के डर से
कहीं भाग जाऊँ?
या तुम्हारे खत का
यहीं रुक कर
तुम्हारा इंतजार करूँ?
बोलो तो
क्या बात है कि आज
दाईं आँख फरक आई है?
"""""""
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
----------------

No comments:
Post a Comment