फिर शान से जनाजा निकला ( गजल)
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तेरी जुल्फों की जद से निकला,
तो राहों में न कोई सायबां मिला/
जहाँ कहीं तफ्तीश की, न मिला
जो मिला भी सामां, रायगां निकला/
अपना शहर छोड़ते वक्त, अहाते में
इक पेड़ अपने हाथों रोप आया था,
मुद्दतों बाद लौटा जो तेरे शहर से,
वही शजर अपना पहचाना निकला/
कद्र की होती जो तूने मुहब्बत की,
अजनबी शहर जान मैंने छोड़ा न होता,
तू अपने हाल में मस्त, सफर में मैं मस्त,
सूटकेस में मेरे न तुझे कोई सामां मिला/
मकतबे- इश्क नसों में खूँ बन कर
हिलोरें लेता फिरता था दिल तक मेरे,
गर जो तू साथ न मेरा छोड़ कर जाती,
मेरा सब कुछ पेश तुझे बतौर नजराना होता
तुझे चाहा, तुझे चूमा, चाट लिया रुख्सारों को,
वहम- वहम में तुझे क्या क्या न बनाया मैंने
जो कुछ आज तक लिखा गया मुझसे,
वो सब बस तेरा सरापा नगमा निकला/
आजमाने को तुझे तेरा दिल लिया भी,
अपना दिल तुझे दिया भी मैंने,
मेरे अफसाने में मिलन नहीं लिखा,
जो हुआ वो मुहब्बत का शोरबा निकला/
मुहब्बत में जिल्लतों का बोझ उठाना ही
दस्तूरे- महफिल की क्या रिवायत थी,
हम तो इंकलाब के लिए निकले थे,
बज्म में ये शोर कैसा बरपा निकला/
मदहोश होने को हम तेरी
महफिल तक पइयाँ- पइयाँ चले आए,
पता था, सागर था पहले से खाली,
खाली तेरा पैमाना निकला/
दावते- जश्न दिया जाता है करीने से,
लुभा के बुलाया जाता है सलीके से,
पिला-पिला के कर दिया जाता है मदहोश,
तेरी महफिल का ये उसूल पुराना निकला/
पीकर शैम्पेन तेरी निगाहों का,
गिरते-गिरते भी हम सँभल गए,
तेरे पीछे जो हम निकल पड़े,
तो साथ में मेरे सारा जमाना निकल पड़ा
बारीकियाँ मुहब्बत की गर समझ लेती,
गैरों के दर पे यूँ न मैं पशेमां होता,
पहले तो कर दिया तेगे- निगाह से कत्ल,
फिर बड़ी शान से' रतन' का जनाजा
निकला//
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तुम हमें छोड़ दोगी, हम तुम्हें छोड़ देंगे
फिर प्यार का न कोई मर्तबा होगा/
मेरे सिवा तुम्हें इस कदर कौन चाहेगा?
तुम सोचो जरा, कौन होगा खुद ही दुश्मने- जहां?
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प्यार के दरिया से पार उतरना तेरा आसां नहीं
जर्जर कश्ती में सवार हो, किनारा होगा आसां नहीं
अब तो हाथ बढ़ा कर पतवार मुझसे ले ले,
बिना मेरे सहारे पुरखतर रास्ता होगा आसां नहीं//
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जानता हूँ हठीली- गर्वीली तू, तेरी अदा कहती है
आ भी जा अब तू शर्मीली तेरी सदा कहती है/
अपना बनाओ न बनाओ, तुम्हारी मर्जी,
मुझे तो तू हाले-दिल बर्बाद हमेशा से लगती है//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
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