उनसे मिली नजर / ( कविता)
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उनसे मिली नजर और बहक गईं निगाहें/
वो मुस्कराए होठों में ठहर गईं जाती हुई बहारें/
रोम- रोम हर्षाया मेरा रंगीं हो गए सारे नजारे,
सीने में हल्का सा दर्द उठा, किए उन्होंने मूक इशारे/
महफिल में अँधेरा न था, जले चिराग साँझ- सकारे,
प्याला उठा वो पास आए, बाँध दिए बँधन प्यारे,
तस्कीन- ए- दिल हुआ, जिन्दगी को मिले सहारे,
ये ख्वाब नहीं हकीकत था, नयन थे उनके बोझल कजरारे/
उनकी जुल्फों में सावन था, कपोलों पे रंग मनभावन था,
आँखों में नीलिमा थी, मुठ्ठी में फागुन था,
मचलती थी बहार, माथे पे काली बिन्दी का आलम था,
सुमधुर थी बोली उनकी, खुशनुमा उनका आनन था/
लोग लगा रहे थे ठहाके, पान से होठ सँवारे,
वो बोले नहीं, हँस दिए केवल झिलमिल दंत बिचारे,
कमल खिला ताल में, मीन फँसी जाल में,
उनके कदम थिरके, खो गया मैं घुँघरू की ताल में,
उनकी चूड़ी खनकी, बागों में कोयल कुहुकी,
उन्होंने ली अँगड़ाई, लोगों की आँखें झपकीं/
उदास सी जिन्दगी को मिले आज सहारे,
किसी न किसी तरह लगेगी कश्ती किसी किनारे/
उनसे मिली नजर और बहक गईं निगाहें,
वो मुस्कराए होठों में, ठहर गईं जाती हुई बहारें//
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इस जिन्दगी का कोई ठिकाना नहीं
आज है कल नहीं/
गुजार लें ये चार दिन की जिन्दगी
भी आराम से//
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मैंने की थी सिफारिश उनसे,
जामे- नजर के लिए/
उन्होंने प्याला हाथ में थमा दिया,
नजर फिरा लिया//
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राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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