सपनों के सारे महल ( कविता)
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आज तो सपनों के सारे महल ढ़हे जाते हैं/
कुछ पूछ न इरादे भाप बन के उड़े जाते हैं/
दिल में उठती जवान उमंगों की साजिश है,
तेरी नजरों के छलकते जाम को पिए जाते हैं/
कली-कली इतराई, गुंचा- गुंचा फूला अमराई में,
तेरी आँख का काजल बना बदली आज तन्हाई में,
मैं बदहवास होकर दिल के साज पर सदाएँ छेड़ता हूँ,
मैं तन्हां हूँ, बहुत तन्हां हूँ आज इस तन्हाई में/
बेशुमार गमों की पैदाइश हो गई है इस गुलजार में,
गुलों के पाँख आज मेरे लिए खार बने जाते हैं/
आज तो सपनों के सारे महल ढ़हे जाते हैं,
कुछ न पूछ इरादे भाप बन के उड़े जाते है/
तेरी नजरे-इनायत भी दिल पे तीर चलाए जाती है,
तू अपनी आँखों से अश्क भी ढुलकाए जाती है,
रोक ले, रोक ले सनम! पलकों की कोर में अश्क,
दिल की आग गम को जेहन तक बढ़ाए जाती है/
आज हर कोई अपने को दिखाता है बेगाना,
मुझे तो हर कूल-किनारे छूटे- छूटे लगते हैं,
आज तो सपनों के सारे महल ढहे जाते हैं,
कुछ पूछ न इरादे भाप बन के उड़े जाते हैं//
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सितम करना तो हसीनों की चाहत है/
फिर भी चाहे उनको, दीवानों की आदत है//
सारी दुनिया में ढूँढा जाए
गर लेकर चिराग/
कहीं न मिलेगा ऐसा
टुकड़ा- ए- माहताब//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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