अब क्या तुमसे बयान करें ( गजल)
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तुमने हमारे भरोसे कुछ न छोड़ा
अब क्या तुमसे बयान करें/
तुमसे फिर भी मिलें तो क्या
अपनी मौत का सामान करें/
तुमसे ही जिया थी, मेरे आस्माने-
मुकद्दर के चाँद-सितारों में,
जब तुम ही नहीं रहे अपने,
चाँद-सितारों से क्या पैमान करें/
करके पर्दाफाश- ए- राज बना दिया,
दोस्तों को भी तुमने दुश्मन,
कौन रह गया अब अपना,
किससे जिक्रे- सितम का ऐलान करें/
मुहब्बत बन गई है उलझी डोर,
सिरा मिलता नहीं,
हो गई बड़ी मुश्किल अब
मुश्किल कैसे आसान करें/
पहले तुम्हारी यादों में ही,
सुबह से शाम, शाम से रात होती थी,
भले- बुरे जो थे, तुम्हीं थे,
अब सुबह से कैसे शाम करें/
भले बहुत खुशी होती है किसी
अपने को राहों में देखकर,
मुँह फेर के गुजर जाओ जो तुम,
फिर कैसे तुम्हें सलाम करें/
ये सहर, ये शाम, ये फिजायें
सब जो खामोश हो जायें,
डाल लो तुम भी रूख पे नकाब,
तो फिर हम किससे कलाम कहें/
माना हमारी मौत भी तो
तुम्हारी ही खातिर अहले- सितम,
आए न तुम जो जनाजे में,
कैसे' रतन' खुद फातिहा बयान करें//
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शम्मअ- ए आरजू बुझ गई मेरे दिल की,
अब मुझे रहा किसी का ऐतबार नहीं/
हर शख्स हो गया बेगाना, देख मुझे अकेला,
तुम्हारी ऐसी मुहब्बत का मैं तलबगार नहीं//
राजीव रत्नेश
1975 ई०
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
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