सुनो कागा बोला ( कविता)
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सुनो कागा बोला फिर काँव,
समझते हो ये क्या कहता है,
तुमसे मुझसे कहता है,
फिर वही पुरानी बात/
टूट गए रिश्ते-नाते,
वह दो रोज का व्यवहार/
अब नहीं रहा कोई ठाँव,
सुनो कागा बोला फिर काँव/
प्रीत- पुरातन में आग लगी,
सर्द कुहरे में प्रेम- प्रतिमा जली/
एक बार शमां जली,
एक बार फिर बुझी/
अब नहीं दामन की छाँव,
सुनो कागा बोला फिर काँव/
प्रतिपल छाए तुम रहते,
मन के वितान में/
मेरी धूनी रमती है,
वहीं कहीं श्मसान में/
अब तो मंद हो गई है आग,
सुनो कागा बोला फिर काँव//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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