Sunday, February 1, 2026

पीछे ही हटना था जो

पीछे ही हटना था जो
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तड़प-तड़प के दिल पे चोट खाई तनहाई में/
बैठा हूँ तेरे इंतजार में, वो पहले मोड़ की अमराई में/

चुभन दिल में होती है, क्या जाने तू कितनी गहराई से,
हम भुला न पाए तुमको अपनी दिमागी समझदारी से/

सरफरोशी की तमन्ना अब तो मेरे दिले- मासूम में है,
आ जा तू भी सू- ए- मकतल, बहाना बना चतुराई से/

उमंगों से दिल भी अब तो उतना उछलता भी नहीं है,
नहीं बजती दिल में अब तो प्यार की कोई शहनाई है/

हाँलाकि दिल तप कर हो गया है अब तो रेगिस्तान,
अब तो आ जाओ सजनी सजी-धजी साड़ी धानी में/

किधर निकल गए हम तो सपनों की महफिल से दूर,
सुबह-सवेरे आती हो तुम याद साथ- साथ जम्हाई के/

इश्क का बुखार तेरा दो रोज में ही आखिर कैसे उतरा,
क्यूँ अब भी ढूँढ़ेंगे तुझे हम फिर से तेरी गुमशुदगी में/

यही तो कमी है, दिमाग तो है पास, पर दिल ही नहीं है
जो था भी, लगाया किसी घनघोर चित्तचोर शिकारी से

तुम से बढ़ कर एक से एक हसीन है तुम्हारे मुहल्ले में,
तुम सा जिद्दी न हमने पाया किसी को अपनी जिन्दगी में/

अगर पीछे ही हटना था तुझे, चार कदम पहले मंजिल के,
बढ़ना ही न था तुझे कदम- दर - कदम मेरी आशिकी में
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हाले-दिल बेकरारी का ये आलम है,
           तू न मगरमच्छ के आँसू बहा,
दामने- दिल तार-तार हुआ, दिया था
           गुल तुझे जूड़े में सजाने के लिए/
अब तुनुकमिजाजी छोड़ कर,
           पूछ तो लो इक बार तबीयत का हाल,
हम तुझे आखिरी छोर तक सदा देंगे,
           भेजेंगे कासिद को तुझे समझाने के लिए//
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क्या पूछें तुमसे, उल्टा जवाब मिलता है
वैसे बाजार में सेहरा बेहिसाब मिलता है
लगता मर्जी तुम्हारी नहीं, साथ निभाने की
वक्त-बेवक्त खरा तुम्हारा जवाब मिलता है

             राजीव रत्नेश
         मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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