Saturday, February 7, 2026

तुमसे दूर अब....!!! ( कविता)


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क्या कहूँ तुमसे कुछ कहा नहीं जाता/
तुमसे दूर अब और रहा नहीं जाता/

जिन्दगी तल्ख हुई जाती है,
उल्फत जुल्म हुई जाती है,
सरापा तेरा ऐ गुलबदन!
आँखों में शहतीर हुई जाती है/

दर्द दिल का अब सहा नहीं जाता/
तुमसे दूर अब और रहा नहीं जाता/

मेरी जिन्दगी में भी में थी तुमसे रौनक,
मेरी जुस्तजू में थी तुझसे चमक,
चाँद भी लगता है अब  तो मुझे बेनूर,
आस्माने- मुकद्दर में थी, तू बिजली की तड़प/

पासवां दोस्त के अब बैठा नहीं जाता/
क्या कहूँ तुमसे कुछ कहा नहीं जाता/

राहें मेरी रौशन थीं तेरे ही दम से,
बुलबुले- चमन चहकती थी तेरे दम से,
मेरी जाने- करार थी तू ही ओ अहदे- वफा,
इंतजार था तेरा मुझको दस जनम से/

दाग दिल का मुझसे मिटाया नहीं जाता/
तुमसे दूर अब और रहा नहीं जाता/

लाख अलमस्त हों हजार फिक्रो- गम से हम,
तुम बिन मगर जिन्दगी खुशगवार नहीं,
लाख सावन का महीना हो, होती रिमझिम हो,
तेरी जुल्फों के बगैर मगर कोई बरसात नहीं/

मुझसे किसी और का सनम हुआ नहीं जाता/
तुमसे दूर अब और मुझसे रहा नहीं जाता//

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आग बरसाने लगी अब तो ये पवन,
दूर हो गया जबसे मेरा' ताजमहल',
चंदा की चाँदनी खटकने लगी दिल को,
रुलाने लगा और भी उनका वसंती वसन//

                 राजीव रत्नेश
           मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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