संसृति ही जीवन है ( कविता)
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संसृति ही जीवन है
यही तो मेरा कला सदन है
जीवन की हरियाली में देखो
खिला आज भावसुमन है
मीठी- मधुर तुम्हारी बातों में
प्रकृति के झंझावातों में
एक भाव आलोक चाँद
झिलमिलाता है सितारों में
जीवन की मधुरतम अभिव्यंजना
बस है तुम्हारी ही रूपरंजना
तनिक इक मुस्कान लजीली
ऐ मेरी मधुर काव्य कल्पना!
हर साँस में प्रिये तुम्हारी
तरंगित मेरा छोटा उपवन है
संसृति ही जीवन है
निष्ठुर! कैसा यह पट परिवर्तन?
भावों का गह्वर नर्तन
प्राण- प्रतिष्ठा कर गए पत्थर में
आज फिर कैसा प्रतिमा- विसर्जन
लगता चंद सुधियों का मेला
आज आई मधुर मिलन- बेला
इंद्रधनुषी रंग फैला जीवन का
ऐसे में फिर मैं क्यूँ अकेला?
आज तो आबाद मेरा
सरल गीतों का मधुबन है
संसृति ही जीवन है//
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चाँद मुस्कराए, सितारे झिलमिलाए नील गगन में,
हमें नींद नहीं आती आज इस उजड़े चमन में/
हर आहट पे हम तुम्हारे लिए नजर उठाते हैं,
तुम्हीं बता दो क्या लुत्फ मिलता है इस सितम में//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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