छेड़ना माशूक को बुरा होता है ( कविता)
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छेड़ना रोज माशूक को बुरा होता है/
रोज का उनको टोकना बुरा होता है/
दिल जाता है किसी और पर तो जाने दो,
वो हमें चाहते हैं सोचना बुरा होता है/
मैं मंजिल पर पहुँचा भी तो किस काम का,
न तो सागर का ही रहा न जाम का/
साकी ने पिलाया तो बूँद- ए- जहर मिला दिया,
न खुदा ही मिला, न मजा मिला विसाल का/
मेरी मानो तो फिर न जाना करीब यार के,
फिर उसी पत्थर से टकराना बुरा होता है/
खत उनका देखा था, जो लिखा था यार को,
लिखा था प्यार अमर है, दिखा देंगे संसार को/
मेरे लिए लिखा था कवि हूँ, दार्शनिक हूँ,
मैं क्या जानूँ चक्कर- ए- प्यार- व्यार को/
एक ही इशारा होता है काफी समझदार को,
बेवफा जान कर भी न मानो तो बुरा होता है/
खिड़की के सामने यूँ तो आया न करो,
आ भी जाओ तो हड़बड़ाया न करो/
समझ लो ये तो उनकी बुरी आदत है,
वो आँख मिलायें तो शरमाया न करो/
खिड़की से गिरे खत तो शुक्रिया कहना,
समझ लो देना खते- जवाब बुरा होता है/
नदी किनारे संग उनके जाना जोखिम है,
तिस पर यारे- जानां साथ, पूरी साजिश है/
गर जो यार उनका तुमको घूर-घूर देखे,
बहाने से छू-मंतर हो जाना ही लाजिम है/
सँभल पाने की नीयत न रखो दिल में,
इश्क में गिर कर सँभलना बुरा होता है//
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