मुहब्बत का तमाशा ( कविता)
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भूत चढ़ जाए गर मुहब्बत का,
हर फिजा रंगीन नजर आती है/
मुहब्बत के फसाने में हर चीज अनोखी,
इन्कार भी मुलाकात की इल्तजा लगती है/
छा जाए सूरत जो महबूब की दिल पर,
अदा उसकी बाँकी नजर आती है/
खता हो, भले ही लाख उसकी मगर,
हर पैमाने पर मासूम नजर आती है/
दिल हो जाता है, हाँलाकि तप कर रेगिस्तान,
फिर भी सब्ज- बाग नजर वहाँ आता है/
बिन उनके लगता है चमन उजड़ा- उजड़ा,
अपना महबूब ही माली नजर आता है/
देख कजरिया प्रिये की अँखियन की,
प्रिय के दिल की धड़कन बढ़ जाती है/
वो ही होते हैं अपने तो सबकुछ,
जब उनकी जवानी खिल के मुसकाती है/
एक ही बेरूखी से दिलबर की,
उनकी आँखों में सैलाब उमड़ आता है/
किस बात से खफा- खफा है सनम,
सोच कर दिल प्यार से तड़प जाता है/
किसी को तड़पाना अपने प्यार में,
किसी-किसी का पेशा होता है/
हर वफा भूल जाते हैं वो आखिर में,
ऐसा मुहब्बत का तमाशा होता है//
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जामे- गमे- बेवफाई कुछ
इतना ज्यादा पिलाया है आपने/
नशे में हूँ, कह नहीं सकता
बड़ा अहसान किया है आपने//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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