सफर ( गजल)
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जिन्दगी का सफर कुछ दिन
तुम्हारे साथ भी गुजरा/
हमदम रहे चंद रोज, वक्त का
ठहराव नहीं अखरा/
हँसते-खिलखिलाते बीत गए
वो चंद दिन भी,
मैं रहा मँडराता तुम्हारे इर्द-गिर्द
जैसे कली पे भँवरा/
हर वक्त याद आती थी तुम्हारी
मुझको सहरा में,
जाने कितने बियाबनों का
सन्नाटा दिल से गुजरा/
मैं महसूस करता हूँ अभी भी
तेरी उसाँसे,
जैसे मेरे पहलू में बैठी हो
तुम करके कोई नखरा/
सौगात सारे निसार दिए
तेरे एक तब्बसुम पे,
जिस पर हर वक्त रहता था
जमाने का पहरा/
अब तो ये आलम है कि
तेरे बिना दिल नहीं लगता,
और जमाने की लानतें सहते
सहते दिल टूट-टूट बिखरा/
अपना न था कोई, न है
एक सिवा तुम्हारे,
और तुम हो कि इतनी दूर
बनाया अपना आशियाँ/
याद तुम भी मुझे करते हो
इतना तो रफीक ने लिख भेजा,
इसीलिए कहता हूँ" रतन" का भी
तुम्हारे सिवा नहीं कोई दूसरा//
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सभी हैं चाहने वाले हुस्न को तेरे,
मिट गए तेरे लिए, चाहने वाले तेरे//
राजीव रत्नेश
1974 ई०
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद

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