क्यूँ तू मुझसे निस्बत रखती है? ( कविता)
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क्या तू मुझसे झूठी मुहब्बत करती है?
या ख्वामखाह मेरी सोहबत चाहती है,
नहीं जानता बारीकियाँ इश्क की,
न जाने क्यूँ तू मुझसे निस्बत रखती है/
मुहब्बत जोर मारेगी, तू खिचीं आएगी,
मजलिस में तेरे रुख्सारों की सुर्खी सताएगी,
अन्जान इतनी न बन, यदि मुक्कदस कहानी तेरी,
नजरों में तेरे सुर्ख डोरे की लाली शरमाएगी/
कुछ तो बात है, जो मुझसे मतलब रखती है,
क्या तू मुझसे झूठी मुहब्बत करती है/
खड़की से सुब्हे- रौशन की रश्मि तुझे जगाती है,
इक अँगड़ाई के साथ बदल करवट तू फिर सो जाती है/
देवी- जागरण से बदन क्या तेरा टूट रहा होता है,
या फिर खुद तू मधुर सपनों में खो जाती है/
कैसे कहूँ तू मस्त बहार! मेरी खिदमत करती है,
क्या तू मुझसे झूठी मुहब्बत करती है/
नवजवान दिलों में धड़कन बन के रहती हो,
कभी- कभी मेरी नजरों में नजरबंद हो के रहता हो/
जाने क्या सूझी तुझे, इस बाली उमर में,
दिल में मेरे सजा-ए- उम्रकैद गुजारना चाहती हो/
तू सिर्फ अपना इजाफा- ए- अज्मत चाहती है,
यही बात है क्या, जो तू मुझसे निस्बत रखती है/
दिलजलों की बातों पर ध्यान दिया न करो,
लुटते हों अरमान, तुम ख्याल किया न करो/
अभी ही तो हमने भी तुझे जाना- परखा है,
इक ही नजर में ढेरों सवाल किया न करो/
खुद नहीं जानती, और मुझे नसीहत करती है,
या ख्वामखाह मेरी सोहबत चाहती है/
जमाने से टक्कर इक दिन तेरी-मेरी होगी ही,
इसके पहले जमाना दीवार बने, हो जा मेरी ही/
दिल से तुझे सदा देता, हसरते- दिल पूरी कर दे,
तुम हुनरमंद हो, दुनिया तो कमबख्त है ही/
पेश तू मुझे अपने रहमो-करम करती है,
न जाने क्यूँ तू मुझसे निस्बत रखती है/
इक बार बढ़ गए कदम, लौटना गँवारा न हुआ,
भले हट गए वो, हटने का मेरा इरादा न हुआ/
किसी ने समझी ही नहीं, इश्क की अज्मत वरना,
हम भी क्या करते, कोई सहारा अपना न हुआ/
तुम भी कुछ ऐसा करने की हिकमत चाहती हो,
क्या तू मुझसे झूठी मुहब्बत करती है/
मेरी तरफ से हरकत ऐसी मुझसे न बन पड़ेगी,
भले इक बार जमाने से, मुझसे ठन पड़ेगी,
हम मुब्तिला- ए- इश्क होकर, तुझी से अमान माँगेंगे,
हर साल की दीवाली की तरह रौशनियाँ जल उठेंगी/
क्या है मेरी अखि्तयारे- किस्मत, समझती है,
या ख्वामखाह मेरी सोहबत चाहती है//
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कल मेरी जान आएगी, साथ में सपनों की बारात लाएगी,
सुब्ह आए चाहे शाम आए, याद मुझे आज सारी रात
आएगी/
उसको पा कर दिल उमगता है मेरा प्यार की शिद्दत
से,
वो आएगी तो मेरे लिए, आँखों के प्यालों में शराब
लाएगी//
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ऐ मुहब्बत तू मेरी जानी-पहचानी है,
इक तिरी तस्वीर ही मेरे पास निशानी है/
तेरी नथ की नग, सितारों सी झिलमिलाती है,
कभी हिलती है, कभी करामात दिखाती है//
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दिल के सहरा पे, हुई थी इनायते- सावन कभी,
ऐ जाने- बहारां! आई थी खुद तू मेरे पास कभी/
दिलजलों की भी नजर थी तेरे हुस्नो- शबाब पे,
तेरी रजामंदी सुनने को तरसते थे मेरे कान कभी//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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