मेरे कमरे में सोई है ( कविता)
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मेरे कमरे में सोई है इक चाँद कि किरन/
मेरे पहलू में सोई है, सिमट कर रूप की किरन/
हर क्षण उसका साथ इक नया अनुभव देता है,
उसका इक परिहास मुझको अतिरेक वैभव देता है/
मेरे शाने पे बिखरी उसकी घटा जैसे कुन्तल,
उसका स्पर्श मुझे अनमोल, अतीव गौरव देता है/
सोचता हूँ, पेश करूँ उसको इक नव- सुमन/
मेरे कमरे में सोई है इक चाँद की किरन/
जगत तो सदा रीति-रिवाजों पर ही जीता है,
मगर कोई-कोई सिर्फ व्यवहारों पर ही जीता है/
मैं फकत इतना जानता हूँ कि वह मेरी है,
इसी अहसास पे" रतन" न मरता है, न जीता है/
खुशबू फैली हर तरफ, बदन उसका गुलबदन/
मेरे कमरे में सोई है इक चाँद की किरन//
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सज-सँवर कर किस दुनिया से तुम आती हो?
बातों से मुझे भरमाती, याद सपने दिलाती हो/
पहलू में बैठ कर तुम भी पिओ और पिलाओ,
मेरी गजल का हर मिसरा पूरा तुम कराती हो//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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