गर तुमसे जो शर्मिन्दा न होता ( कविता)
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खुदानखास्ता गर जो तुम,
राहों में मिल जाओ,
ये है गुजारिश,
न तुम मुझसे बोलना/
मुहब्बत भी थी,
इकरार भी था कभी तुमसे,
मगर बात ये सच है,
न तुम अब मुझे टोकना/
साध ये रही,
महीनों मेरे मन में,
तुमसे मुलाकातें,
यूँ ही होती रहें,
तुमसे रोज बातें,
यूँ ही होती रहें/
मगर तुम्हारे अपनों से
हैरान, परिशान हूँ मैं,
तुम्हें क्या कहूँ?
सोचता हूँ,
तुम्हारा सामना होगा तो,
कैसे मैं तुमसे बात करूंगा/
कहीं ऐसा न हो,
मैं सामने से हट जाऊँ,
क्यूँकि मैं तुमसे,
शर्मिन्दा हूँ,
उस रोज की बात से/
करके वादा- ए- मुलाकात,
फिर तुमसे मिला नहीं/
वो मेरा वफा का इकरार था,
तुमको भी तो इंतजार था/
मैं क्या जानता था,
मिलन की वो घड़ी,
उपहास करेगी,
हमारा- तुम्हारा/
यह गठबंधन,
न किसी को रास आएगा/
न सजेगी महफिल,
न बजेगी पायल,
न अब कभी मधुमास आएगा/
वो तुम्हारा चंचल अदा से,
भूरे बालों का लहराना,
सर झटक के,
अंगुली को होठों पे रोकना/
सब कुछ अदाशार ही तो था,
वो बहकना,
रुठना
मचलना
मस्ती अदा- अदा में थी,
मस्ती तुम्हारी सदा में थी,
मैं भी तो यही चाहता था,
काश!
साथ तुम्हारा,
हमेशा का हो जाए/
इस थोड़ी सी बाकी,
जिन्दगी का सहारा हो जाए/
यूँ तुमसे रिश्ता टूटेगा,
गुमां न था,
तुम्हारी चाहत होते हुए भी,
मैं तुमसे मिल न सकूँगा/
जानता था तुम त्रेता की सीता हो,
भले आज कलियुग में बनी तुम रीता हो,
शरमाने की अदा तो राधा की है,
भक्ति-भावना में बिल्कुल मीरा हो/
लेकिन लाख तुम,
मीरा हो
राधा हो
गीता हो
सीता हो
गुजारिश है तुमसे,
आ जाओ कभी राहों में,
भूल-भटक कर भी,
न टोको
न बोलो
न सलाम
न बंदगी फरमाओ/
क्यूँकि, मैं भी तो
यही करूंगा,
तुमको देख कर भी,
अनदेखा करूंगा/
भले दिल में तड़प ही हो,
पर तुम समझती हो,
मैं तुम्हें, हर हाल,
उस वक्त
रुस्वा ही करूँगा/
क्यूंकि------
मैं इस काबिल न रहा,
कि रुबरु तुम्हारे होऊँ/
तुम्हारी भोली चितवन,
का जवाब,
अपनी अदाओं से
अपने शेरों से
अपनी सदाओं से
अपनी आहों से
किसी तरह भी
तुम्हें दे पाऊँ/
तुमपे बीतेगी क्या,
मुझे तो मालूम नहीं,
तुम अकेले में करोगी क्या,
ये मुझे मालूम नहीं/
मैं जानता भी नहीं,
जानना चाहता भी नहीं/
किसी की चोट से,
मुझे वास्ता ही क्या,
खुद भी तो गम का,
एक बहता हुआ दरिया हूँ/
लगता है,
तुम वीरान चमन की,
वो कली हो,
जिस पर चोट शायद,
कभी लगी नहीं/
दिल लगाया है तुमने,
पहली- पहली बार,
आँखें की हैं चार किसी से,
पहली- पहली बार/
वो तुम्हारी अदा कहती है,
वरना बहकती होतीं,
निगाहें तुम्हारी/
किसी की बेताब,
तमन्नाओं पे,
निकलती होतीं,
आहें तुम्हारी/
पर वहाँ ऐसा कुछ,
भी तो न था,
तुम रहीं बवफा,
स्थिर रहीं निगाहें,
वो रह- रह कर,
मचलना तुम्हारा,
मुझे भी तड़पाना,
और खुद भी तड़पना,
नाले से अपने आस्मां गुंजाना/
जानता हूँ मैं,
न तुम भूल पाओगी,
चंद इन मुलाकातों को भी,
रहेगा अहसास,
याद आएगी हर कहीं,
वो मुहब्बत की लगी/
बन में
बागों में
गली- कूँचों में
गावों में
शहरों में
घरों- होटलों में
पर सभी कुछ हाले-दिल,
तो रस्मन रहेगा/
तुम किसी की बनोगी,
फिर भी सभी कुछ,
रिवाजों के बंधन में होगा/
मैं यूँ ही हर किसी से,
प्यार कर-कर के,
वफा खोजता फिरूँगा/
और यूँ ही नया-नया,
तजरबा हासिल करता रहूंगा/
पर इतना यकीं है,
तुमसा वफादार न मिलेगा/
काश! मैं मजबूर न होता,
वो अन्जानापन,
तुम्हारे अपनों ने,
मुझसे बढ़ाया न होता/
मैं तुमसे हर बंधन,
तोड़ के मिलता,
गर जो तुमसे शर्मिन्दा न होता//
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वस्ल का आसरा
जबसे नहीं रहा मुझको/
क्या हूँ, कहाँ हूँ?
कुछ पता नहीं मुझको
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चंद लम्हों के लिए ही
उनसे मुलाकात हुई/
जुबां काम न आ सकी
आँखों से बात हुई//
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राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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