कश्ती हवाले- तूफान हो गई ( कविता)
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ये किसी ने क्या किया कि जिन्दगी वीरान हो गई/
छोड़ गए सफर में साथ, कश्ती हवाले- तूफान हो गई/
उनको मनाने की गरज थी मनाया भी खूब,
हाले-दिल सुनाना था उनको सुनाया भी खूब,
उनको न मगर रुकना था, न सुनना था कुछ,
कासिद को भेज-भेज कहलवाया भी खूब/
प्यार की मंजिल बेरुखी ही अंजाम हो गई/
छोड़ गए सफर में साथ, कश्ती हवाले- तूफान हो गई/
दुनिया इक नई बसाने के लिए दी थी सदा उन्होंने
इक दूसरे का होने की दी थी रजा उन्होंने,
कभी हम राहे- वफा से गुमराह भी हो गए थे,
तब खफा ही रहने की दी थी सजा उन्होंने/
उनकी ही याद में देखो सुबह से शाम हो गई/
छोड़ गए सफर में साथ, कश्ती हवाले- तूफान हो गई/
बहारें भी चलीं कुछ रोज गुल्जारे- इश्क में,
रही खानी कुछ रोज कली के गुले- रुख्सार में,
इक भ्रमर ऐसा आया, छीन ली कलियों की लाली,
वो भी चली गई दूर कहीं फूलों के इस व्यापार में
बहारे- चमन ही ये मेरी मौत का सामान हो गई/
छोड़ गए सफर में साथ, कश्ती हवाले- तूफान हो गई/
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चार घड़ी की मुहब्बत को तूल दे दिया,
अपनी मुख्तसर सी जिन्दगानी में/
पहले दिल में रहता था, आरजुओं में ढल कर,
अब रहता हूँ तनी भवों के बीच, उसकी पेशानी
में/
राजीव रत्नेश
मुट्ठीगंज, इलाहाबाद/
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