Sunday, February 1, 2026

तुम मेरी हो जाओ तो कैसा? ( कविता)

तुम मेरी हो जाओ तो कैसा?  ( कविता)
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अगर तुमसे बात हो जाए तो कैसा?
ये गैर बीच से हट जाए तो कैसा?
मैं तुम्हारा बनूँ, तुम मेरी हो जाओ,
प्यार की दुनिया बस जाए तो कैसा?

मैं जहाने- जां से नजरें फेर लूँ,
दरख्तों के पीछे से तुम्हें ढूँढ़ लूँ,
तुम अपने आँचल का परचम बनाओ,
कोई निशानी दिखाओ, मैं तुम्हें ढूँढ़ लूँ/

गर यह दूरी कम हो जाए तो कैसा?
तुम खुद आगोश में आओ तो कैसा ?

मैं तुम्हारे प्यार का दीवाना,
तुम शमां हो मैं परवाना,
तुम इसे खेल न समझो,
मैं लाया हूँ दिल नजराना/

तुम यह तोहफा अपनाओ तो कैसा?
मैं तुम्हें गले से लगाऊँ तो कैसा?

ये आज की बहारें कल चली जाएँगी,
क्या पता लौट के आएँ न आएँ,
तुम खफा न होना न रूठना,
गैर महफिल से भले जाएँ तो जाएँ/

तुम आज दौरे- शराब चलाओ तो कैसा?
तुम मस्त आँखों से पिलाओ तो कैसा?

झूमने को नशे में जी चाहता है,
तुम्हारी जुल्कों में खोने को जी चाहता है,
तुम हो मेरी साकी मैं तेरा शराबी,
तुम्हारे हाथों से पीने को जी चाहता है/

तुम आज भेदभाव भूल जाओ तो कैसा?
अपने हाथों से पिलाओ तो कैसा?

अपने आँचल को आज लहराओ,
पावों में अपने महावर रचाओ,
तुम आज घूँघट ओढ़, मेरी बन कर,
चाँद-सितारों का जी ललचाओ/

तुम्हारी डोली मेरे घर पे रुके तो कैसा?
ये गैर बीच से हट जाए तो कैसा?
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अशआर
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आरजुएँ तमाम होती हैं जिन्दगी की,
हसरत सिर्फ एक होती है-------
चाँद तो कर जाता है दगा भी,
मगर रोशनी अपने साथ होती है//
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दिल को तुझे पाने की वहशत थी,
तू न मिली खुदा की कुदरत थी,
प्याला लगा के होठों से हटाया तुमने,
मुझे सिर्फ नशा- ए- नजर की जरूरत थी//
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दिल की धड़कनें
         दिल में समा नहीं रहीं,
साँस का ये हाल है
         कि रुक-रुक कर आ रही/
कलेजा निकाल के
         रख दिया आपके कदमों पे,
मगर तुम्हारी मस्त नजर
          हम- किनार होने से शरमा रही//
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               राजीव रत्नेश
        मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/

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