तुम्हारे प्यार का गर ( गजल)
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तुम्हारे प्यार का गर मुझको सहारा न होता/
फिर जीने का मेरा भी ऐसा इरादा न होता/
न देती साथ जो तुम बन कर कश्ती- ए- उल्फत,
फिर नसीब मुझको भी हुआ ये किनारा न होता/
गैर भी थे, तुम्हारे रुखे- रौशन पे नजरें टिकाए,
कैसे आते महफिल में, जो तुम्हारा इशारा न होता/
इल्जामे- तिशनगी की तोहमत, अकेले क्यूँ मुझी पर?
कैसे पीता जामे- निगाह, जो तुमने पिलाया न होता?
जुनूने- शौक में ही खिंच गया था तुम्हारा पल्ला,
काश! शोर भरी महफिल में तुमने मचाया न होता/
वह भी न लाता तुम्हारे लिए बाजार से सोहन हलवा,
जो अंगूर तुमने उसको अपने हाथों खिलाया न होता/
गर जो तुमने मेरी वफा का पैमाना न ठुकराया होता,
तो हुआ पैदा पहले तो ऐसा खौफनाक नजारा न होता
मैं रहता तुम्हारा, तुम बनती दुल्हन मेरी हर हाल में,
आज गर्दिश में हमारी मुहब्बत का सितारा न होता/
न लगाती तुम आँखों में, मेरे प्यार का सुरमई काजल,
दिल मेरा फिर तायरे- मजरूह सा छटपटाया न होता/
सभी हैं बौरवलाए, भरी बज्म में है हर तरफ हल्ला,
काश! ऐसा बुरा बहाना तुमने भी बनाया न होता/
बदनाम किया गैर ने तुमको, तुम्हारी ही महफिल में,
मैं न देता साथ, जो तुमसे जुड़ा मेरा फसाना न होता/
दिल से अपने तस्वीर तुम्हारी, हर्गिज मिटाई न होती,
लिख कर नाम जमीं पर मेरा, तुमने मिटाया न होता/
पहले भी था और आज भी है असर प्रूफ' रतन',
काश! तेगे- निगह अबस तुमने चलाया न होता//
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तुम्हारे आने से मंजर
महक सा उठा/
किसी न उलट दिया हो जैसे
गुलदस्ता गुलाब का//
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बहुत हुआ तो तेरी पशेमानी पे
हम भी पशेमान हो लेंगे/
तुझको मनाने का ये अंदाज
भी जरा हट के है//
राजीव रत्नेश
1974 ई०
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
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