बहार आने को है ( कविता)
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अब तू मुस्कराने को है/
लगता है बहार आने को है/
तेरे इकरार का आलम,
लगता बस दिल बहलाने को है/
गरज नहीं मेरे इस प्यार की,
आने वाली इस बहार की/
सौगातें लुटाओ सुफेद दाँतों से,
इक हल्की सी पहचान सी/
अब नीला आँचल लहराने को है/
लगता है बहार आने को है/
मौसम होता जा रहा है खुशनुमा,
खिलने लगा है बाग का हर गुंचा/
कलियों पे भी छाई है मस्ती,
ऐसे में क्यूँ भ्रमर है अनमना/
शायद कली पे शबाब आने को है/
लगता है बहार आने-आने को है/
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न दो दिल में जगह
गलतफहमी को इस तरह/
जो मैं हँसती रहती हूँ
चमन में घूम-घूम बेखबर//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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