Saturday, February 7, 2026

बहुत दिन हुए ( कविता)

बहुत दिन हुए   ( कविता)
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आज तो लिखे हुए गीत बहुत दिन हुए/
छोड़ के जबसे गए मीत बहुत दिन हुए/
मैं बहुत समझदार तो नहीं, जो समझ सकूँ,
यह सोचे होगी हार कि जीत बहुत दिन हुए/

मैं उनके नजरों के पैगाम समझता हूँ,
उनका इशारे से करना सवाल समझता हूँ/
वो कहें दिन को रात, सूरज को चाँद समझता हूँ,
यानि कि मैं उनके हर जज्बात समझता हूँ/

घड़ी भर की बात न थी, अरसे से साथ था,
रिश्ता खत्म हुआ, टूटे हुए दिल बहुत दिन हुए/

मेरी नजर आज भी उस खिड़की पर रहती है,
आता था कभी नजर चाँद सा मुखड़ा जहाँ/
आज तो केवल सलाखें और बंद दरवाजे हैं,
सोचता हूँ, कहाँ गया भूरे बादल का टुकड़ा कहाँ?

मेरी आँखों में ही होगा तिनका, वो सोचते होंगे,
उनकी आँखों में देखे मुझे शहतीर बहुत दिन हुए/

सोचता हूँ कायनाते- इश्क उठा कर चल पड़ूँ,
कहीं मिल न जाएँ रहजन, हमसफर के वेश में/
यूँ तो किसी से नहीं डरता पर बेवफा से डरता हूँ,
जाने कहाँ पिला देगी जहर, यहाँ कि परदेश में/

मैंने ढ़लती जवानी की बेवफाई खुद देखी है/
चले गए वो, देखे उनकी प्रीत बहुत दिन हुए//
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इंतजार इंतजार इंतजार
            किए जाओ इंतजार,
हर हाल में रखो अपने
            इश्क पर ऐतबार/
इजहारे- जफा भी उनकी,
            अपनी कोई फितरत है,
कथनी- ए- माजी में आस,
             करनी पे न हो शर्मसार//

                    राजीव रत्नेश
          मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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