मैंने प्यार खो के बहुत कुछ पाया ( कविता)
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मैंने प्यार खो के बहुत कुछ पाया/
तुमने प्यार पाकर आखिर क्या पाया/
कहने को सभी हैं आपने,
मौके-बेमौके दिखाते हैं सपने,
पर जान मैं आज पाया,
निखिल जग यह पराया/
मैंने प्यार खो के बहुत कुछ पाया/
तुमने प्यार पाकर आखिर क्या पाया/
जिन्दगी के सफर में,
मिले थे तुम हमसफर बन,
मेरा मीत, बना दुश्मन क्यूँ?
आज तक मैं जान न पाया/
मैंने प्यार खो के बहुत कुछ पाया/
तुमने प्यार पाकर आखिर क्या पाया/
गीत थमा जीवन का,
वीणा के स्वर मंद हुए,
टूट गया क्षण में,
सदियों जो सपना सजाया/
मैंने प्यार खो के बहुत कुछ पाया/
तुमने प्यार पा के आखिर क्या पाया/
क्षण भर में लुटती जवानी,
बेमोल बिकती है जिन्दगानी,
" ताज" तुम कुछ यूँ रूठे,
सपने भी आँखों में सजा न पाया/
मैंने प्यार खो के बहुत कुछ पाया/
तुमने प्यार पा के आखिर क्या पाया/
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मैं ही क्या कहूँ, तुम खुद मेरे मुखातिब हो जाओ,
जिन्दा कम से कम इक बार मेरी खातिर हो जाओ/
हर गम में, हर खुशी में याद तुम्हें ही तो करता हूँ,
नाम कमाया है तो, बदनाम इक बार मेरी खातिर हो
जाओ/
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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