Saturday, February 7, 2026

आते हैं सभी महफिल में ( कविता)

आते हैं सभी महफिल में  ( कविता)
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सजा कर दिल की महफिल, अरमान सँजोए- सँजोए/
आते हैं सभी महफिल में तेरे, गुले- लब खिलाए- खिलाए/
निगाहें मस्ती में पुरजोश, इन्तरव्वाबी- इन्तरव्वाबी
दीद तेरा करते हैं, तेरी हिकारत पे झुंझलाए- झुँझलाए/

बात इक रोज की नहीं है, ये तो हाल है सुब्हो- शाम का
बात अफसाने की नहीं है, इक वक्त है बस अंजाम का
सभी को खुशी होती है, तुझसे मुलाकात होगी,
मैं ही बस गुल्शन में विचरता हूँ, इक गमे- शाम सा/

बात ऐसी भूले से भी, जुबां पे आए न आए,
ऐसा न हो कि फिर जिंदगी मुझे भाए न भाए/
जेरे- लब तेरे भी मनमोहक फूल खिले रहते हैं,
आते हैं सभी महफिल में तेरे गुले- लब खिलाए- खिलाए/
ये फिजाएँ पुरनम- पुरनम, ये मौसम शराबी- शराबी,
आँख तेरी पैमाना- ए- इश्क, हुस्न तेरा शबाबी- शबाबी
अहसासे- गैरत से दिल जाने क्यूँ मचलता है मेरा?
जबकि हर राजे- अदा है तेरी बिल्कुल किताबी- 
किताबी/
अफसाना- ए- दिले- बेकरार तुझे अब कौन सुनाए-
सुनाए,
नग्मा- ए- इश्के- गुल अब कौन गुनगुनाए- गुनगुनाए/
टहनियाँ भी पुरशबाब, फूल भी खिले-खिले से अहले-
चमन,
आते हैं सभी महफिल में तेरे गुले- लब खिलाए- खिलाए/

दर्जा- ए- जिन्दगी मनमोहक साज हो भले ही,
फिजाओं में तेरी पुरदर्द इश्क की आवाज हो भले ही/
कौन दिल के रुठे तारों को भूले से भी छेड़े,
भले वो इक शायर या नगमासाज हो भले ही/

अफसाना- ए- इश्क भला अब रंग क्या खिलाए- खिलाए,
मजबूर दिल अरमानों की दुनिया अब क्या सजाए-
सजाए/
कली शोख, गुल भी रंगीं, मगर गुलचीं है उदास,
आते हैं सभी महफिल में तेरे, गुले- लब खिलाए-
खिलाए/

माना हँस कर ही कहा, फिर न कभी आने के लिए,
फिर कोई बात तुम्हें आँखों से सुनाने के लिए/
मगर मजबूरी- ए- दिल में ऐ चमन! गुल क्या करे?
माना तुमने दे दी हो सजा न कभी मुस्कराने के लिए/

अब फिर कौन नगमा- ए- इश्क गुनगुनाए- गुनगुनाए,
बुते- जफा से कौन अब फिर दिल लगाए- लगाए/
हो गए हर साज बेसुरे, गुले- चमन बेनूर, बेनूर" रतन",
आते हैं सभी महफिल में तेरे गुले- लब खिलाए- खिलाए//
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मेरे आने से पहले, वो हो गई कुछ ज्यादा उदास,
लौट के अपने शहर आऊँगा, उसे नहीं रही कोई आस
आज भी बेसब्री से वो करती होगी मेरा इंतजार,
किस तिलस्म में आकर खो गया, खुद नहीं याद//

                 राजीव रत्नेश
         मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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