Saturday, February 7, 2026

अब तो होश में आ ( कविता)

अब तो होश में आ   ( कविता)
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अब तो होश में आ मेरी जोहरा जबीं /
बहुत दिनों से लूटा है तूने दिल का यकीं/
ये चाँद, ये सितारे सब तेरे दम से होंगे,
घूमती है पर मेरे इशारे पे ये जमीं/

तूने करार लूटा दिल का पर सुकूँ दे न सकी,
प्यार किया मगर प्यार का जुनूं देन सकी/
मुहब्बत पे हैं अहले- दुनिया उँगली उठाने को,
तू आज तक मेरे दिल को यकीं दे न सकी/

बरसा सावन भी, पतझड़ भी आखिर बीत गया,
जेठ की दुपहरिया बीती, शरद भी अब तो आ गया/
पर आया न तुझे कभी तर्ज- ए- इजहारे उल्फत,
चेहरे पे तेरे अब तो रंगे- गुलाबी का निखार आ गया/

दिला जोश अब फिर से, मेरे दिल के मकीं
अब तो होश में आ मेरी जोहरा जबीं!

कलियाँ चटकी हैं बागों में अलग रंग- ओ- नूर से,
बादे- सबा बहती है मस्तानी तेरे आलमे- जहूर से/
एक गुलाब तेरे गुल्शन का खिल के मुरझा गया,
दिल मेरा बेकल है आज भी गर्दिश- ए- नक्शेतूर से/

समां है सुहाना, रूत भी बड़ी मस्ती भरी है,
आज के मौसम में बड़ी जवानी भरी है/
आँचल रह- रह के ढल रहा काँधे पर से,
तेरी तो आज हर अदा दिलकश सुहानी सही है/

आजा अब तो करीब मेरे दिलनशीं!
अब तो होश में आ मेरी जोहरा जबीं!

समंदर ने उठाया है ज्वार कितनी बार,
रह- रह के अपनी उत्ताल तरंगों से/
मेरे दिल ने रह- रह ली है अँगड़ाई,
दिल में तेरे उठती उमंगों से/

बेसहारा क्यूँ बनने लगा है हर सहारा,
कैसी ये तूने आज आग लगाई है/
खुद ही हर उम्मीद पे पानी बनती है,
जबकि प्यार की जिन्दगी इस दफा मुस्कराई है/

आरिज तेरे रह- रह के हो रहे सुरमई/
अब तो होश में आ मेरी जोहरा जबीं!
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दमे- गुलगश्त ख्याल ये आता है,
तुम जो आ जाओ कहीं से चमन में/
कलियाँ गैरत से जमीं में गड़ जाएँ,
मस्ती इक आ जाए पवन में//

               राजीव रत्नेश
        मुट्ठीगंज, इलाहाबाद/
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