तुम्हारी राह तकता रहा ( कविता)
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प्रीत के क्षण याद कर साथी
पथ में दीप जलाए तुम्हारी राह तकता रहा
चलता रहा यूँ अकिंचन सा डगर में
रखा न नाता कभी नश्वर इस जगत से
सितारे भी न बहला सके मुक्त गगन के
तुम्हारे साथ का अहसास ही दिल में समाता रहा
प्रीत के क्षण याद कर साथी
पथ में दीप जलाए तुम्हारी राह तकता रहा
मैं न ठहरा कभी, न उलझा किसी की बातों में
इस आस से, सपने सजेंगे कभी बाहों में
किसी दरख्त के पीछे से आओगे तुम राहों में
बस यूँ ही भावनाओं का समंदर दिल में लहराता रहा
प्रीत के क्षण याद कर साथी
पथ में दीप जलाए तुम्हारी राह तकता रहा
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/

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