मैं हूँ दीवाना किसी का ( गजल)
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मुझको अपना होश नहीं,
मैं हूँ दीवाना किसी का/
जलता हूँ मुहब्बत में,
मैं हूँ परवाना किसी का/
लुटाता हूँ हस्ती- ए- दिल,
है ये नजराना किसी का/
तारीकी में यूँ शमां जली,
लगा मुस्कराना किसी का/
पैमान- ए- वफा करते हैं पहले,
फिर हमीं से शरमाना किसी का/
कब कौन किस पे हँस दे,
नहीं है ठिकाना किसी का/
आँखों से पिलाते हैं वो मय,
खुला आज मयरवाना किसी का/
सीने पे तीर कई चलते हैं,
चिलमने- मिजगां उठाना किसी का/
ढूढ़ते हैं सभी डायरी में मेरे,
गमे- अफसाना किसी का/
सजा चाहे जो दो, दिल हाजिर है,
ये है हरजाना किसी का/
न हो मुज्तर ऐ' रतन',
सलामत है रहम खाना किसी का//
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ख्वाबों में तुमको गले से लगा लिया,
पछताया बाद में कि ये मैंने क्या किया/
खुद पशेमां हूँ अपने आप से भी मैं,
कर देना माफ, गर मैंने कुछ बुरा किया//
कल जो वो मिल बैठे, रहनुमा बन के,
हम दिल दे बैठे उन्हें, अपना समझ के//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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