तुम ही कुछ बोलो ( कविता)
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वैसे तो ये राज न खुलेगा,
बात छुपी- छुपी रहेगी,
तुम ही कुछ बोलो,
मर्म अंतस का खोलो,
क्या प्यार मुझी से है?
क्यूँ ?
दीवाने तो और भी हैं,
मुझसे हसीं,
मुझसे खूबसूरत/
ये क्या राज है?
तुम्हारी बहकती है क्यूँ नजर?
ये बात कुछ और है/
बरसात यूँ ही होती रहेगी,
तन-बदन यूँ ही जलते रहेंगे,
तमन्नाएँ ख्वाब बनती रहेंगी/
तुमन बोलोगी,
तो मैं क्या समझूँगा?
क्या जानूँगा?
जो दिल में है तुम्हारे,
भरता रहूँगा सिर्फ आहें,
अपनी शैया से गिनता रहूँगा,
सारी- सारी रात सितारे/
मेरे दिल को करार देने को,
कुछ इजहारे- उल्फत तो दो,
मैं भी तो जानूँ,
इश्क क्या है?
ये हकीकत क्या है?
तुम्हारी नजरों की,
गुफ्तगूँ क्या है?
बसेगी बगिया प्यारी,
कुहुकेगी कोयल मतवाली,
आओ जो प्यार की राहों में,
ओ गुलाबी गालों वाली!
मस्ती मेरे नगमों में ढ़ल जाएगी,
कशिश मेरी बात में आ जाएगी,
ये बेनाम सी शाम सँवर जाएगी,
सारी फिजा निखर जाएगी,
गर जो तुम आओ/
इसीलिए तो कहता हूँ,
तुम आओ मेरे पास,
खोल दो हर राज,
कुछ समझा के/
तभी तो मैं,
कुछ आगे आ सकूँगा,
तुम्हारी मुहब्बत का दीप,
दिल में जला सकूँगा,
तुम्हारी स्निग्ध निगाहों का,
सवाल समझ सकूँगा/
होगा कुछ भी नहीं,
यूँ रोज की मुलाकातों से,
जब तक इजहारे- कसक,
बातों से जाहिर न की जाए,
आँखें तो दगा भी देती हैं,
इनका क्या ठिकाना?
आ जाओ जो,
बना दूँ प्यार का आशियाना,
बस-----
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ये जो अरसे से होती नहीं मुलाकातें,
हमारी- तुम्हारी होती नहीं दिली बातें/
क्या बात है, तुम दूर- दूर ही रहती हो?
न बजती शहनाई, न ही सजती बारातें/
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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