Sunday, February 1, 2026

मेरी रगों में लहू का ( गजल)

मेरी रगों में लहू का  ( गजल)
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बहुत भोली, बहुत सादा- ओ- मासूम है वो/
लगता उल्फत की बातों से अभी अंजान है वो/

कितना ही बचाएँ, शौक- ए- मुहब्बत रखता है,
आजकल मुझ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है वो/

नजदीकियों में भी नजर से ही काम लेते हैं,
मुझे लगता है कि खाला- ए- शैतान है वो/

शिकवा- ए- मुहब्बत तो बस उसका बहाना है
दिलनशीं फिजाओं में चमने- इश्क गुलजार है वो/

बन के, बागों का खिला गुले- अनार है वो,
सुबह का मेरा खुल्लम खुल्ला इंतजार है वो/

राहे- वफा का मैं तो इक अदना मुसाफिर हूँ,
मेरे सफर की मंजिल, मेरा मुकाम है वो/

उसकी नाक के नीचे काला सा जो तिल है,
मेरे प्यार के दर का लगता दरबान है वो/

क्या मुझे चाहिए, समझता है वो सही-सही,
मेरे आरामे- सफर का मुकम्मल इंतजाम है वो/

मेरी रगों में उसकी याद के लहू का संचार है,
मेरे लिए वो हुक्म, खुदा का फरमान है वो//
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करीब से करीबतर हर लमहा होगा
नसीब तुझे भी अब चैनो- सुकूँ होगा/
तुम तो बस शुक्र- ए- मुहब्बत ही करना,
दिल का प्याला ही ढ़लका दिया तेरे लिए//
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तेरी तरफ निगाहें हों और लब पे हो खामोशी,
काश! किसी तरह तो नजर आए तेरी सरगोशी/
तुझे उठा कर बाहों में भर लूँ, देख तेरी मदहोशी,
वो दिन न दिखाए मुकद्दर तुझे, देखे तू मेरी सरफरोशी
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हालाते- नाजुक से अब तुझे कौन निजात दिलाए,
करूँ जतन किस तरह तू अब पास मेरे आए/
मिलने की तमन्ना में और भी हम दूर हो गए हैं,
दस्तूरे-इश्क यही है, ढ़ल अश्क तेरे गाल पे आए//
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तेरी मिजाज- पुर्सी में दिल्ली से दौलताबाद जाएँगे,
लगेगी कहीं ठोकर तो अपने शहर इलाहाबाद आएँगे/
तुम अगर साथ दोगी तो साथ जिएँगे- साथ मरेंगे,
सुकूने- दिल को तेरे लिए, तेरे साथ इबादत- गाह जाएँगे//

                  राजीव रत्नेश
              मुट्ठीगंज, इलाहाबाद
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