Sunday, February 1, 2026

आज फिर पैगाम मिला है ( कविता)

आज फिर पैगाम मिला है  ( कविता)
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आज सलाखों के पीछे से फिर पैगाम मिला है/
आज उनसे फिर निगाहें मिलीं और सलाम मिला है/
सनम थे उदास-उदास, मुँह था उनका उतरा- उतरा,
आज उनके बुझे दिल से उठती आहों का पयाम मिला है/

बहुत दिल में आया, उनसे निगाहें फेर लूँ,
पर करते बना नहीं, मेरी आहट पे वो आए थे,
किसी गैर, मेरे दुश्मन का इशारा भी न था,
मैंने बुलाया था तो बाली पे वो आए थे/

बहुत दिनों के बाद आज फिर दिल को विसाल मिला है,
मेरे देने को जवाब आज निगाहों का सवाल मिला है/

यूँ तो मैं बोलूँगा नहीं तो लगता है रहेंगे वो खामोश ही,
नहीं आएँगे वो सामने, गँवारा होगा तन्हाइयों का आगोश ही,
मैं उनको चाहता हूँ जान कर जफाएँ, मजबूरी- ए- दिल है,
नहीं गुनगुनाएँगे तरन्नुम कोई, छेड़ देंगे साजे- गम ही/

आज उनकी निगाहों में अपाइंट- ए- मुहब्बत बहाल
मिला है/
इतने दिनों के बावजूद भी पाक मुझे अपना माल मिला है/

उनकी आँखों में मदिरा थी, जुल्फ थे लहराते हुए,
जाम था हाथों में, सितारे थे महफिल में जगमगाते हुए
निगाहों में वहशत थी, अरमान थे बेचैन- बेचैन,
उदास थे वो मगर आरिज थे उसी तरह दमदमाते हुए/

मैं उनकी निगाहों का यकीं मान कर पी गया/
जबकि जामे- इश्क में उनके, जहरे- जफा कई बार
मिला है/

उनके नीले लहराते आँचल का सरसराना,
झिलमिलाते थे सितारे, आलम मयनोश था,
वो देखते थे रह- रह कर आईना, मैं समझता था,
आगे बढ़ कर बाहों में ले न सका, मदहोश था/

यही तो कमी है मुझ में कि बरदाश्त नहीं होता/
हाथ रगड़े हैं सिर्फ, जब दिल को मलाल मिला है/

जुल्फ हाथों में लेकर, उन्होंने हवा में लहराई,
टपका आँखों से पानी, मैं समझा घटा छाई,
मेरी वंशी बजी अमराई में, फिर उसी लय में,
वो आई तो मैं समझा, राधा फिर रास को आई/

मैं उनके रक्स पर रीझ बार- बार गया हूँ/
जब- जब उनकी अदाओं से इन्त ख्वाब मिला है/

पहुँचेगा इश्क मंजिल पे, इसका तो यकीं है,
वो आएँ साथ या साथ छोड़ जाएँ बात और है,
मैं नहीं करूँगा जफा, भले न छोड़ें वो जफा,
मैं दामन न झटकूँगा, हो जाएँ वो गुमराह, बात और है

मैं उनके दामन बचाने को, अपनी सजा समझता था/
कह दिया उन्होंने सजा माफ, निगाहों का बयान मिला है/
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मेरी नादान वफा! तुम कभी मेरी हो न सकीं,
गैरों से डरती रहीं, कभी उल्फतो- करम पा न सकीं/
अपनी छोटी सी दुनिया में ही तुम घुटती रहीं,
चाह कर भी तुम, मेरी बाहों में आ न सकीं//
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मुझे क्या, मुझे तो तुम जैसे
            बहुत मिलेंगे,
कभी उल्फत में हँसेगे,
            कभी दर्द भी बहुत मिलेंगे/
बस तुम कभी- कभी
             सहारा देने को चली आना,
वैसे तुम्हारे दिए जख्मों पे
              मरहम लगाने को बहुत मिलेंगे//
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स्फटिक चाँदनी है तू
               संगमरमर सा तेरा बदन,
दिल में पूजा था जिसे
               आज वो प्रतिमा मिली/
बड़ी कठिनाई से एक- एक
                पल बीता मेरा,
भाग्य प्रबल है, जो आज
                 मेरी सोई चेतना जगी//
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                  राजीव रत्नेश
            मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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