Saturday, February 7, 2026

कल समां ऐसा तो न था ( कविता)

कल समां ऐसा तो न था   ( कविता)
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जो नजरे-इनायत है तुम्हारी मुझ पर,
पहले कभी असर ऐसा तो न था/
तुम एक हसीं ख्वाब हो, मैं सोचता था,
तुम रहो मेरे साथ सफर ऐसा तो न था/

मैं जानता हूँ, तुम्हारी मधुरिम अपायें,
देती हो दिल से तुम मुझको सदायें/
करतीं इंतजार, रहगुजर पर आँखें टिकाए,
हो सकता है शायद गली में हम आएँ/

तेरी महफिल का आलम पहले ऐसा तो न था/
तेरी आँखों में आँसू, पहले सावन ऐसा तो न था/

ये आँखें गवाह हैं, तुम बिन नींद आई नहीं,
करके वादा- ए-विसाल तुम फिर आई नहीं/
मैं रातरानी की हँसी में खुशी खोजता रहा,
मायूसी में रात कटी, कमलिनी शर्माई नहीं/

बसर होगी यूँ जिन्दगी, गुमां ऐसा तो न था/
जो आज है बात, कल समां ऐसा तो न था//
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हुस्न जब बाम पे आया
             तो सितारे विहँस पड़े,
भँवरा जो बाग में आया,
             तो फूल महक उठे/
मेरे आने की खबर से
             खिली वो इस तरह,
अचानक जुल्मत में कहीं
             जैसे शमअ भड़क उठे//

          राजीव रत्नेश
      मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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