मुझे तड़पाना ना ( कविता)
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अभी कली मोहनिद्रा में है, तुम जगाना ना/
दिल की बात जुबां पे लाके मुझे तड़पाना ना/
जो बातें बीत गईं हैं, उनकी उलझी बातों में,
मुझे उलझाना ना, गम का अफसाना सुनाना ना/
जिन्दगी चली गई, सिफत जान ही बाकी है,
छुप गया है चाँद केवल रात ही बाकी है/
हमारे दिल में इक आग सी लगी हुई है,
सुना है जबसे, तै हो गई उनकी शादी है/
मौसमे-खिजा चमन में आई है, मुझे बताना ना/
दिल की बात जुबां पे लाके मुझे तड़पाना ना/
कभी बहार भी थी चमन में, भौंरे गुनगुनाए थे,
कली-कली के पास मुहब्बत का पैगाम लाए थे/
परवानों को नाज था, अपनी पाक मुहब्बत पे,
कली की आँखों में भी कुछ वफा के साए थे/
देखो दिल के तारों को खुद ही छेड़ दिया है मैंने/
तुम दिल की बात जुबां पे लाके मुझे तड़पाना ना/
उजड़ने लगा गुल्शन, कली की बेवफाई से,
दामने- मुहब्बत तारीक होने लगा झूठी अंगड़ाई से/
हर तमन्ना भाप बन के उड़ी, कुछ ऐसी अदा से,
पर हमें तो नींद आ गई तेरी अमराई में/
उनकी कहानी अपनी जबानी कह डाली मैंने/
देखो भूले से भी तुम उन्हें यह बताना ना/
करीब था जो लमहा वो और दूर होता गया,
होकर अपनों से भी तन्हां, मैं अपने में खोता गया/
कभी एहसास भी दिलाया उन्होंने अपनेपन का,
मगर हो के मगरूर मैं शराबे- मुहब्बत पीता गया/
आज गमे- बेकसी में सँभलना नहीं आता मुझे/
यह बता के उन्हें भी गमगीन बनाना ना//
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वो आशना अजनबी सा गुजर तो गया/
एक उदास लम्हा, जाते-जाते ठहर तो गया/
घड़ियाँ जैसे थम गईं, रास्ता खो गया,
उस एक लम्हे में ही सारा वजूद सो गया//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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