इतनी गिला है तुमसे ( कविता)
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अपनी नजर को इतनी गिला है तुमसे,
ये उठती हैं तो तुम्हारी नजर उठती नहीं/
करीब होती है वो शय- ए- मुहब्बत,
मगर तुम्हारी राय कुछ माकूल होती नहीं/
कितनी रंजभरी हैं दरअस्ल तुम्हारी बातें,
वैसे मुझे तो आदत है सहने को घातें- प्रतिघातें/
तुम्हारी मुहब्बत से तो मुझे कोई बैर नहीं,
आ जो जाओ राहों में, हो जाएँगी हमसे मुलाकातें/
जज्ब- ए- दिल को इतनी गिला है तुमसे,
तुम्हारी चाक-चौबंद नजर भी तुमसे सँभलती नहीं/
मुहब्बत तुमसे हो गई है, बस बात यही है,
अब तुम्हारे शरमाने की कोई बात नहीं/
लोगों की बातों पे जाती हो क्यों तुम?
सोच लो ये मौका तो आता बार- बार नहीं/
पास मेरे जब भी आती हो अपनी अमीरी छोड़ कर,
तुम्हारे जुल्फों की गिरह तुमसे बँधती नहीं/
अपनी नजर को इतनी गिला है तुमसे,
ये उठती ह

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