तेरी झील सी आँखों में ( कविता)
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तेरी झील सी आँखों में कितने डूबते-उतराते हैं?
तेरे प्यार का सहारा लेकर कितने पार उतर जाते हैं?
तुम जब हँसती हो, बिजलियाँ चमक जाती हैं,
तुम आँख उठाती हो तो मयखाने खुल जाते है/
इश्क की तपन, दिल की जलन लेकर महबूब मेरे
आज फिर से तेरी महफिल हम आबाद करते हैं/
सभी छोड़ कर दुनिया अपनी, आते हैं तेरे मयकदे,
और हम परवाने हैं कि बिन शम्मअ जले जाते हैं/
देख लेते हैं जब गैर के लिए, तेरी आँखों में इंतजार,
जबीं पर दर्द बिचारे रह- रह कर उभर आते हैं/
क्यूँ गैरों के दामन के लिए तरसती रहती हो कभी,
हम भी तो महफिल में तेरी सिर्फ लेकर तड़पन आते हैं
शम्मअ तो रात भर जलती है जब प्यार के मौसम में,
हम देखते हैं हर तरफ हजारों परवाने निकल आते हैं/
आकर पहलू में इक बार, कर दो जिंदगी भर को
गुनहगार,
हम भी बिना मकसद तो नहीं महफिल में सुलट जाते हैं/
आज मेरे लिए भी अपने मयकदे को रंगी मिजाज कर
लो,
बोतल नहीं चाहिए, जाम भी नहीं, नजरे- खास से ही
हम बहक जाते हैं/
ये शाम नहीं औरों के लिए, इत्मीनान तो रखो साकी- ए- महफिल,
किया तुमसे वादा, एक हमीं हैं, जो निभाने चले आते हैं/
फिर किसी तूफां का, खौफ नहीं होता हम दीवानों को
जब मरुस्थल में इक बार आकर सावन बरस जाते है . --------+++----------
उनकी महफिल में गुजरी है रात,
जिन्दगी थोड़ी मुस्कराई भी है/
दिल में आरजुओं की प्यास,
आज हर हद से गुजर आई भी है//
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बहुत खूब यह बात भी,
हम पर उधार रही/
तुम्हीं ने चाहा और,
मेरी फरियाद रही//
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जिंदगी मेरी एक जख्म है,
आरजू तेरी एक नज्म है/
तू आज भी छनकाती पायल,
अदा तेरी सरे- बज्म है//
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अभी कमसिन हो, नादां हो
खो दोगी कहीं दिल मेरा/
ले लेना जवान होकर,
यह दिल है सिर्फ तेरा//
देखा वो था तुमने भर नयन मुझको,
सहला गई थी मस्त पवन मुझको/
साँसों में तरंगित थी तेरी भंगिमा,
मस्त बना गई थी तेरी गजल मुझको//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलादाबाद/
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