काश! तूने प्यार किया होता ( गजल)
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काश! तूने किसी से प्यार किया होता/
मुझे छोड़ कर जाने का फिर फैसला किया होता/
चली जाती तो चली जाती छोड़ अकेला मुझे,
मैंने तेरा साथ निभाने का न वायदा किया होता/
कलियाँ चटकती हैं बहारों में, फूल खिले जाते हैं,
काश! जाने से पहले गुल्शन का नजारा किया होता/
जुल्मी जमाना हो तो क्या, मेरा भरोसा भी न था तुझे,
महफिल से जाने का कम से कम इशारा किया होता/
जवाब में तेरे हाथ का पत्थर आता, जो तुझे रोका होता,
जाना ही था तुमको, जाने से पहले न ये तमाशा किया
होता/
भँवरे हैं बेसुध, उनको रंगत नहीं मिलती खिजां में,
अखरता न हमें भी, कुदरत ने जो ये करिश्मा किया
होता/
हम- तुम साथ- साथ होते, हाथ न तूने मुझसे छुड़ाया
होता,
डगमगाती कश्ती बीच भँवर में, काश! तूने न किनारा
किया होता/
मुहब्बत का तगादा भी तो तुझसे, करते न बना मुझसे,
और पहले काश! अपनी नजरों का निशाना किया
होता/
हम देर से समझे तेरा मतलब, थोड़ा पहले बताया होता,
हमको गैर समझा था तो, दिल में तूने न बसाया
होता/
नजरों का धोखा ही होता है, मृगतृष्णा का सरोवर,
किसी अन्जान पथिक को तूने न रास्ता बताया होता/
गर्म आँसू टपके मेरी आँखों से, सर्द कुहरे में भी,
राह में रोक तूने अपने आँचल का न सायबां किया
होता/
जाम की जगह जहर पिलाते, हँसी-खुशी पी लिया
होता,
कुछ पल ही और जीने का मुझको न सहारा किया
होता/
तेरे जाने से पहले, तेरा रास्ता हम रोक लेते' रतन',
गर जो दिल ने अपना कुछ हौसला ही किया होता//
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क्या खूब लगती हो, क्या- क्या है खासियत तुम्हारी/
मेरी नजर में परी से बेहतर है, हैसियत तुम्हारी/
अनमोल हो मेरे लिए, तेरे सिवा नहीं लगता कहीं दिल,
नाज उठाए हैं तेरे, नहीं जानते क्या है कैफियत तुम्हारी//
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सँवर गई हो पहले से कुछ ज्यादा ही तुम,
दिल मेरा हो गया है, पहले से ज्यादा संजीदा/
क्या कहूँ तुमसे, तुम मेरी भी नहीं पराई भी नहीं,
बेबाक हो गई हो, पहले वाली नहीं रही हसीना//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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