बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार ( कविता)
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बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार
घड़ी-घड़ी में दिल टूटा करते हैं
कभी उल्फत मिली, कभी मायूस हुए
कभी सनम खुश तो कभी रूठा करते हैं
नजरों में मायूसियों का ज्वार मगर
दिल में जज्बातों का बाजार गरम होता है
कभी भूले से जो नाम वफा का लिया
बात की बात में हौसला ठंडा होता है
नहीं अच्छा होता रखना किसी पे एतबार
असमय ही सहारे छूटा करते हैं
बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार
घड़ी-घड़ी में दिल टूटा करते हैं
मुहब्बत की सब्ज बागिया में
कुछ रंग खिजा के भी होते हैं
कली की नयन- मदिरा पी कर फूटे
कुछ ऐसे भँवरे भी होते हैं
चटक-मटक तो रहती है, हर कली में
अक्सर उनके दिल में खोट हुआ करते हैं
बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार
घड़ी-घड़ी में दिल टूटा करते हैं
सर्द हवाओं का मौसम हो तो क्या?
उनकी रंगीन जफाओं का जल्वा न हो
दिल की प्यास जवान हो तो क्या?
कहीं भूले से भी बलवा न हो
कहीं गिरती है कली जो शाख से
उठाने वाले हर कहीं मिला करते हैं
बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार
घड़ी-घड़ी में दिल टूटा करते हैं//
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मेरे शाने पर सर रख के
मुस्करा के न आँखें मिला सपना!
न बढ़ा उंगलियाँ मिरे होंठों की तरफ
कहीं आ न जाए तुझपे दिल अपना//
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दिलो- जां से मैं तुमको चाहता हूँ/
तुम्हारी खुशी, मुझको चाहो न चाहो/
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पूछने गए हम तो उनकी तारीफ/
मगर वो भी उनका आशिक निकला//
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जाने किस कदर सूरत तुम्हारी
दिल में समा गई
हम तो कुछ न समझे और
बात यहाँ तक आ गई//
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नीमबाज आँखे तौबा ये भोली चितवन
हुस्न से तेरे शरमाती चंदा की किरन
बहारों का समा तेरे दम से है सनम
तुझी से खुशगवार है सारा ये आलम//
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मैंने जग को भुला दिया
पुरानी यादों से/
तिरी याद नहीं भूली मगर
ऐसी बातों से//
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जाने क्यूँ तरसती है
मुहब्बत के लिए दुनिया/
हमें मालूम है, मुहब्बत
कुछ नहीं रुस्वाई के सिवा//
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रंजो-गम जमाने भर के भूल गया/
तुम याद रहे, तुम्हारा सितम याद रहा//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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