लुभाया है मुझे ( कविता)
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तुम्हारी भोली सदा ने लुभाया है मुझे/
तुम्हारी मासूम अदा ने पास बुलाया है मुझे/
हसीन रुख्सारों की सुर्खी ने कहा है कुछ,
काली उड़ती जुल्फों ने अपना बनाया है मुझे/
जवानी तिलस्म सी लगती है तुम्हारी,
खानी इश्क की लगती है तुम्हारी,
बढ़ आने की तमन्ना है तुम्हारी प्यार में,
सचमुच शीरी की कहानी लगती है तुम्हारी/
मजबूर मुहब्बत की दास्तां नहीं सुननी मुझे,
जुनूने- इश्क की करामात दिखाओ मुझे,
काले बादल को देख कर आहें भरो मत,
हिम्मत हो तो मेरा हाथ थाम के दिखाओ मुझे/
तुम्हारी स्निग्ध निगाहों ने कुछ सुनाया है मुझे/
काली उड़ती जुल्फों ने अपना बनाया है मुझे/
बार- बार करीब आना और जाना तुम्हारा,
अचानक नजरें मिलने पर शरमाना तुम्हारा,
प्यार के दो बोल बोलने की कौन कहे,
वो बातों पर भी मेरे कभी झिझकना तुम्हारा/
भंगिमा तुम्हारी सोजों से पुरनूर थी,
अंग-प्रत्यंग में मस्ती भरपूर थी,
आग होठों की लाली से उठी, बढ़ी
क्या गजब की वो शमशीर थी/
तुम्हारी आँखों ने खूब पिलाया है मुझे/
काली उड़ती जुल्फों ने अपना बनाया है मुझे/
तुम्हें पाने के लिए मैं गुमराह हो गया हूँ,
मंजिले- मकसूद से नामुराद हो गया हूँ,
इश्क की महफिलें सँवारूँ किस तरह,
अपनी जिन्दगी के लिए भी बेबुनियाद हो गया हूँ/
समझने लगोगी जब तुम मुझे अपना,
और समझा दोगी दिलों की दास्तां,
जब हो चाह दिल में, दोनों ओर से जागी हुई,
तभी तो होता है तय मंजिल का रास्ता/
तुम्हीं ने सुना है और कुछ सुनाया है मुझे/
काली उड़ती जुल्फों ने अपना बनाया है मुझे/
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देखो सनम! तुम बहकी-बहकी बातें न करो,
करनी हो बातें तो इकरार की बातें करो/
चोट कैसे लगी, तुम क्यूँ पूछती हो?
करनी हो बातें तो दवा देने की बातें करो//
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अगर वो आएँ तो उनसे मेरा सलाम कहना,
उनसे ऐ मेरे दोस्त, मेरे दिल का बयान कहना/
तिस पर भी जो वो खामोश रहें, गुमसुम रहें,
प्यार को भूल कैसे गए, ये उनसे सवाल करना//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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