लगती है कोई चोट फिर से तो...( कविता)
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यूँ तो मुझे चोट की कोई फिकर नहीं,
किसी की कैसी भी बात का असर नहीं/
लेकिन लगती है घाव में फिर से चोट,
तो सोचता हूँ, अब दर्द की दवा करूँ/
कहीं यह चोट नासूर न बन जाए,
दिल के उसी घाव की तरह,
वो रिसते हुए जख्म ही कहीं,
न मेरी जिन्दगी का साथ निभाएँ/
यूँ तो मुझे चोट की कोई फिकर नहीं,
लेकिन लगती है घाव में फिर से चोट,
तो सोचता हूँ, अब दर्द की दवा करूँ/
चोट हर किसी ने दिया-----
किसी ने जिन्दगी के जाम के साथ,
जहरे- बेवफाई पिला दिया,
किसी ने अपने हाथों जाल लगा कर,
शिकारी को खबर कर दिया/
अनेकों दर्द मिले हैं,
अनेकों घाव दिए हैं जग ने, तुमने,
तब कहीं जाकर ये घाव,
बेअसर हुआ है/
न करूँ दवा तो कोई हर्ज नहीं,
अभ्यस्त हूँ इस दर्द का/
बस... लगती है कोई चोट फिर से,
तो सोचता हूँ, अब दर्द की दवा करूँ/
मैं जानता हूँ, मेरे मर्ज की,
तुम्हीं बस एक दवा हो/
तुम्हीं हो जो मेरे लाइलाज दर्द को,
मेरे हृदय की रगों से दूर कर सकते हो/
तुम्हीं हो जो, रिसते हुए जख्मों को,
छू सकते हो, सहला सकते हो/
और ये भी जानता हूँ,
तुम ये कर नहीं सकते,
रिवाजों के दायरे में रह कर/
इसीलिए तो दर्द यह पाले जा रहा हूँ,
धीरे- धीरे हर गम का,
अभ्यस्त होता जा रहा हूँ/
लेकिन लगती है कोई चोट फिर से,
तो सोचता हूँ, अब दर्द की दवा करूँ//
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दिल में मेरे जब गजल लिखने का उबाल आता है,
नजर तेरी चित्तचोर जवानी का उठान आता है/
अकीदते- मुहब्बत मुझे अब सिखा के होगा क्या?
तुझे पूजा था, तेरे बाद ही खुदा का ख्याल आता है//
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तू ही मेरी जन्नते- ख्याल,
तू ही मेरी जज्ब- ओ- जान/
किस तरह जिन्दा हूँ दूर होकर,
तू ही मेरी मुहब्बतो- अरमान//
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मेरे एहसास की कीमत दे दे,
नगद दे दे या उधार दे दे/
आज की रात मुझ पर भारी है,
जाती बहार! सुबह की सौगात दे दे//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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