दिल लगाना, दिल्लगी हो गई है ( कविता)
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तेरी सूरत दिल में इस कदर बस गई है/
लगता है मुझे कोई बीमारी बेतरह सध गई है/
हर घड़ी तुझसे मिलने का ही होता है ख्याल,
जाने मुझे कैसी बेहाली आदमकद जम गई है/
तुझसे मुलाकात ही मेरी जिन्दगी बन गई है/
तेरी सूरत दिल में इस कदर बस गई है/
मोहतरिम भी नहीं तू मेरी मगर अब तो,
तू मोहतरिमों से बढ़ कर दिलनशीं हो गई है/
तेरा बातें करना आँखों में आँखें डाल कर,
दिल में मेरे कुछ अजीब सरकशी हो गई है/
उल्फतो- रहम तेरा अब मेरी बन्दगी बन गई है/
तेरी सूरत दिल में इस कदर बस गई है/
तूने रुख से हिजाब हटा जो दिया दफअतन,
दिल में मेरे अजीब सी धुकधुकी हो गई है/
तूने जल्वा भी कुछ ऐसा दिखाया मुझको,
देख कर तबीयत बिल्कुल ही हरी हो गई है/
तू किसी तरह भी, अब तो समझ जा" रतन'',
दिल लगाना अब तो दिल्लगी बन गई है//
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सर्द हवाओं की थोड़ी छींटाकशी के बीच,
मेरे नयन में तैरता, तेरा सुन्दर, सलोना मुखड़ा/
खूबसूरती बढ़ा देता है, काली अलकों के बीच,
जबीं पर चमकता तेरे इक चमकीला सितारा//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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