तुमसे कहना चाहता हूँ ( कविता)
*************************
ऐ सनम! यह मेरा गुनाह नहीं
जो मैं तुमको चाहता हूँ/
तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा
यही तुमसे कहना चाहता हूँ/
थकने लगी है निगाह इंतजार करते- करते,
जबां लड़खड़ाने लगी है, दास्तां कहते-कहते,
वादा- खिलाफ मैं नहीं, तुम भी नहीं,
बात है, कुछ कह नहीं पाता तुमसे कहते-कहते/
मुहब्बत की राह का नया राही हूँ,
तुमको चाहता हूँ/
तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा
यही तुमसे कहना चाहता हूँ/
देखना गुल न हो जाए लौ मुहब्बत की,
तमन्ना रह न जाए अधूरी उल्फत की,
तुम बस मुझको, सिर्फ मुझको चाहती रहो,
मैं तोड़ दूँगा, हर डोर उल्झन की/
मैं तुम्हारे लिए बंधन में बँधना चाहता हूँ,
तुमको चाहता हूँ/
तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा
यही तुमसे कहना चाहता हूँ/
देखो किस अदा से सुबह मुस्कराने लगी,
आ गई बहार जो तुम गुनगुनाने लगी,
फूल खिलने लगे, कलियाँ चिटकने लगीं,
मेरी हर बात पे जो तुम खिलखिलाने लगी/
इस मैदान को मैं गुलजार बनाना चाहता हूँ,
तुमको चाहता हूँ/
तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा
यही तुमसे कहना चाहता हूँ/
तुम्हारे लिए नित कल्पनाएँ किया करता हूँ,
हर घड़ी तुमको देख-देख के जिया करता हूँ,
तुमको याद करता हूँ, तुम्हें न देख कर,
कभी तुम्हें भुलाने को जी भर पिया करता हूँ/
आकाश में एक तस्वीर सी बना रहा हूँ,
तुमको चाहता हूँ/
तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा
यही तुमसे कहना चाहता हूँ//
---------------
अशआर
''""""""
तुम्हारी फितरत कुछ समझ आती नहीं/
कैसी उल्झी है ये डोर कि सुलझ पाती नहीं//
--------
मुझे अश्क नहीं
चाहिए तेरी उल्फत की खानी/
नहीं चाहिए ये शराब
चाहिए तेरी शबाबे- जवानी//
----------
इस गुस्से पे कौन न मर जाए?
शामिल हो जिसमें तेरी अदा भी//
---------
भले न रुख दिखाओ तुम,
भले न दो खते- जवाब/
अरे! दिल मचलने तो दो,
कौन देखेगा ये पर्दा- ओ- नकाब//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
------------------

No comments:
Post a Comment