तुझे सुनाने के लिए ( गजल)
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दिल से इक तेरा गम मिटाने के लिए/
क्या- क्या न कीं हिकमतें तुझे भुलाने के लिए/
नजरों में तेरी बेरुखी की लाली छाई जाने कब से?
कहाँ- कहाँ नहीं भटका हूँ, दिल को बहलाने के लिए/
दर्दे- दिल मिट न सका, जख्मे- जिगर भर न सका,
लाख मसीहा ने मरहम दिए मुझे लगाने के लिए/
नींद उड़ी, सुख-चैन गया, दिल बेकरार रहा न रहा,
कोशिश नाकाम हुई, दिल की लगी बुझाने के लिए/
सागरो- मीना से दिल लगाया, लबे- साकी से निस्बत
रखी,
जगह न मिली तेरी महफिल में, जब सर छुपाने के
लिए/
इक सादालौह पर इल्जाम तमाम तुमने धर दिए,
मिला न कोई जो और, तुझको मिटाने के लिए/
खता क्या हुई? छोड़ी जो तुमने रस्मे- उल्फतो- करम,
तुमने ही हाथ बढ़ाया, जाम में मेरे जहर मिलाने के लिए/
महफिल में तुम्हारी चाहत के दीवाने और भी तो थे,
हमीं को क्यूँ चुना था तुमने, निशाने के लिए/
जुम्बिशे- गोशा- ए- लब में, अब वो कशिश न रही,
फिर भी गजल लिखता है" रतन" तुझे सुनाने के लिए/
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दिल में अकेला तेरा ही गम है/
आँख हो गई अब मेरी नम है/
मौत ने दी है, अब थोड़ी मुहलत,
पलट आ कि अब जिंदगी कम है//
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रहे- गुमरही पर जाने से पहले इक बार बताया होता/
सारे गिले-शिकवे भुला के, तुझे कलेजे से लगाया
होता/
तू ही मेरी सात समंदर पार वाली परी थी,
सारे जमाने को ठुकरा कर, तुझे अपना बनाया होता//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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