Saturday, February 7, 2026

मैं चकोर हूँ, तुम चाँद सही ( कविता)

मैं चकोर हूँ, तुम चाँद सही   ( कविता)
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मैं चकोर हूँ तुम चाँद सही/
जीवन- नाव की एक पतवार सही/
साथ होते जो आज भी तुम,
साहिल बन जाती ये मँझधार कहीं/

निकल पड़ा हूँ लेकर जीर्ण- नाव,
लग रहा आज मँझधार से,
डगमग होती है कभी- कभी,
तूफान के पागल प्यार से/

फिर भी बुलाता हूँ तुमको,
मिलना तुम्हारा दुश्वार सही,
मैं चकोर हूँ तुम चाँद सही/

दूर तक नजर नहीं आता,
थल, बाग या किनारा,
क्षितिज पर लाल आभा फैल रही,
फिर भी दूर तक न कोई सहारा/

एक तुम्हारा ही सहारा है,
भले तुमको मुझसे प्यार नहीं,
मैं चकोर हूँ तुम चाँद सही/

नीली लहर अब तो,
क्षण- प्रतिक्षण हो रही काली,
बंद कर द्वार उपवन का,
साँझ गए जैसे लौटे माली/

साथ छोड़ दिया तुमने,
फिर भी है तकरार नहीं,
मैं चकोर हूँ तुम चाँद सही/

उपक्रम करता हूँ नये-नये,
और खेल करती यह नये-नये,
लहरों ने जोर मारा है,
लड़खड़ाती है यह खड़े-खड़े/

शर्माता हूँ कहते तुमसे,
क्यूँकि तुम्हारा दुलार कठिन,
मैं चकोर हूँ तुम चाँद सही//
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तू प्यार को बदनाम न कर,
मंजिले- मकसूद से गुमराह न कर/
आतिशे- दिल अश्कों से न बुझेगी,
देख और मुझे शर्मसार न कर//

            राजीव रत्नेश
        मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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