जान लेना है तो...( गजल)
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जान लेना है तो, कोशिश करो मुस्कराने की,
कोई जरूरत नहीं है, तुम्हें खंजर चलाने की/
इक बार तो मुहब्बत की राहों में आकर देखो,
कोई जरूरत नहीं है तुम्हें, हमें आजमाने की/
ये तो दिल का सौदा है, दिल की लगन है सनम!
न करो बेकार कोशिश, खिलौनों से बहलाने की/
माना बेवक्त दोस्त भी बन जाते हैं दुश्मन मगर,
क्या जरूरत है तुम्हें, दुश्मनी निभाने की/
यूँ भी तो दिल का आशियाना जल गया है,
क्या जरूरत है तुम्हें, आग और भड़काने की/
मुहब्बत में तो लाजिम है शिकवा करना भी,
क्या इसीलिए थी कोशिश आशिक को मिटाने की/
दिल से दिल मिलाओ, तो मुहब्बत रंग दिखाए,
क्या जरूरत है पैमाने से पैमाना टकराने की/
ये तुम्हारी हंस की सी इठलाती चाल वल्लाह,
जान ले लेगी इक दिन तुम्हारे दीवाने की/
तुम तो रोशनी का चिराग जलाओ दिल में मेरे,
क्या जरूरत है तुम्हें, अँधेरा और बढ़ाने की/
मार डालने के लिए काफी हैं, नाजो- अंदाज तुम्हारे,
क्या जरूरत है जाम में, तुम्हें जहर मिलाने की/
कहीं आह ही तुम्हारी, जान न ले ले' रतन' की,
इसीलिए तो कहता हूँ, बनो याद वीराने की//
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तुमने कहा मैंने सुना,
मैंने कहा तुमने सुना/
मैंने कहा शर्मीली,
दीवाना तुमने कहा//
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नजरों को सिर्फ तारीकियों
का अहसास ही था,
जुल्फों को उन्होंने चेहरे से
हटाया चाँद निकल आया//
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राजीव रत्नेश
1974 ई०
मुट्ठीगंज, इलाहाबाद
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