Sunday, February 1, 2026

मैं शायर तो नहीं बस ( कविता )

मैं शायर तो नहीं बस....( कविता)
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बरसती फिजा, रंगीन मौसम,
शाम के धुँधलके में,
चाय के प्याले के साथ,
सनम के रुबरू,
यूँ तो कभी लिखा करता हूँ/
किसी की बेताब तमन्नाओं,
छलकते आँखों के जाम,
उनके ढ़लते आँचल,
बजती पाजेब,
यानी उनकी हर हरकत पे,
कभी- कभी लिखा करता हूँ/

बहुतों ने पूछा, समझा,
ये राज जानना चाहा,
कैसे मैं लिखा करता हूँ?
क्यूँ लिखता हूँ?
क्या मेरे दिल में भी,
लगी है किसी हसीना से चोट?
मैं क्या कहूँ?
लोग इतना भी नहीं समझते,
दिल होते हुए भी,
जज्बात नहीं पहचानते/

अरे, मैं कोई प्रेमी नहीं,
कवि नहीं, दीवाना नहीं,
मैं तो बस, तेरी सदा पे,
लिखा करता हूँ/
मैं कोई शायर तो नहीं,
बस!' जबसे देखा तुमको
मुझको शायरी आ गई/'

तुमने तो देखी होगी,
वही फिल्म' बाबी',
जमाने के बंधन तोड़,
मिले दो प्रेमी कहाँ?
झील में------
गए थे जमाने की,
गर्दिशों से हैरान होकर,
खुदकशी करने.....
जमाना जो दीवार बना था,
उनका हमदर्द बन गया/

इसीलिए तो कहता हूँ,
आओ हम- तुम भी कोशिश करें,
एक बार घर छोड़ कर भागें,
एक बार झील में कूदें,
थोड़ा हल्ला मचे,
थोड़ा दुनिया स्वांग रचे,
फिर गर्दिशों से टकरा कर,
हम एक दूसरे के' वो' बनें/

सच! बड़ा प्यारा लफ्ज है' वो' भी,
कितना अपनापन, कितना अहसास,
नजदीक में सुनाई पड़ती है,
उनकी साँसों की उसाँस,
दिल का दिल से मिलन होता है,
रातें जब बेकल होती हैं,
दिन बीत जाता है उदास-उदास/

सच!' वो' का भी बड़ा काम है,
दुनिया में बड़ा नाम है,
भाभी से कहा,
' चलो देखें फिल्म'
बोलीं,' नहीं जाइए
देख आइए आप,
नहीं तो मान जाएँगे बुरा' वो'/

सच! ' वो' में ही अपनापन है,
हमारा क्या हम तो गैर हैं/
हर बात में बताएँगी वो,
आएँगे' वो' तो जाएँगे,
दार्जिलिंग, शिमला हम,
और मनाएँगे हनीमून/

काश! हमारा भी होता' कोई',
भाभी कहतीं,' चलो, घूम आएँ
मीना बाजार',
हम कहते,' अरे नहीं भई,
मान जाएँगे बुरा हमारे' वो'/
तब शायद' वो' का' वो' से,
बराबर का रिश्ता होता/

जहाँ दिलाते वो,
' वो' का अहसास,
और हमसे करते,
गैर सा बर्ताव,
हम भी कहते,
' हमारा भी है कोई वादा,
हमको है उनके साथ जाना'/
सच बड़ा बढ़िया होता,
यह जवाब,
उनको होता बोरियत
का अहसास,
बेहिसाब/

फिर कभी न कहते,
जाइए देख आइए फिल्म,
हम तो समझते हैं,
शायद करते वादा,
अगले इतवार की फिल्म का,
किसका?
शायद किसी अंग्रेजी फिल्म का/
आजकल उसी का तो बोलबाला है,
जो मतलब समझ ले ठीक,
न समझे तो भोला-भाला है/
बस क्यूँ लिखता हूँ?
कभी- कभी उनके भोलेपन पे,
लिखा करता हूँ/
उनकी बेहिसाब तमन्नाओं पे,
लिखा करता हूँ,
मैं शायर तो नहीं बस.....//
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अशआर
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अब कोई हसीना
         निगाह में जँचती नहीं,
अब अपनी कोई
         तमन्ना सँवरती नहीं/
जबसे पता लगा मेरी
         मुहब्बत का राज सबको,
किसी भाभी से अपनी
          अब पटरी बैठती नहीं//
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अगर जाल डालना हो
          बहुत मछलियाँ मिलेंगी,
अगर इश्क करना हो
          बहुत दिलवालियाँ मिलेंगी/
न छायेगा जिन्दगी में
          गम का अँधेरा कभी,
अरे' रतन' शेर सुनाना हो
          तो बहुत भाभियाँ मिलेंगी//
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अरमान मेरे बनते रहेंगे
          यूँ टोस्ट कब तक,
आप बताइए बनाएँगी
          गोश्त कब तक?
मैं कब तक पीने को
          जाम तड़पता रहूँगा,
कब इकरार करेंगी
          दिलाएँगी जोश कब तक?
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तुम्हारी बहकती नजर
            मुझे हैरान करती है,
तुम्हारी अदा- ए- खास
            मुझे परेशान करती है/
तुम कहती हो तुम पे
            हक मेरा फिफ्टी है,
बस यही बात मुझे
            बेजबान करती है//
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ये आमलेट, ये भुने मुर्ग और कबाब,
मुझे याद दिलाते हैं, तेरा उठता शबाब/
पूछता है बेयरा, लाऊँ क्या जनाब!
तुम ही बताओ, क्या दूँ उसे जवाब?

           राजीव रत्नेश

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