रोज-रोज के वादों का क्या?
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मेरे दिल की तड़पन को,
एक नया आयाम मिला/
पर अपने खोलने को,
उन्मुक्त आसमान मिला/
खोजने थे मोती गहराई में
समंदर का मुझे माप मिला/
अर्थहीन दिल की पगडंडी पर
खिली बहार का साथ मिला/
दिल के जख्मों के लिए
मदावा हुआ, तेरा इलाज मिला/
अपने लिए तो कम फिर भी
तेरे लिए बिना अंदाज मिला/
खरोंच लगी थी शीश- ए- दिल पे
भरने को मरहम ईजाद किया/
फितरत है ये मेरे दिल की
तुझे पाने को हर तरीका इस्तेमाल किया/
जो तू न मिली मुझे साहिल पे
समंदर में जाकर जाल संभाल लिया/
मोती तो गहरे पानी में ही होता है
ऊँचाई पर जाकर गहरी छलांग लिया/
हम तो मर-मिटे, तेरी इसी अदा पे
न फुर्कत में भी कभी याद किया/
एक सिसकारी के साथ हमने
बस तेरा ही तो इक नाम लिया/
यह भी जोश बस नया-नया है
जो अदा- ओ- नाज का जाम पिया/
रोज-रोज के वादों का क्या" रतन"
" हीरक- जयंती" का तुम्हीं ने आगाज किया/
राजीव रत्नेश
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