जाने तुमको किसकी? ( कविता)
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जाने तुमको आज ये किसकी
नजर लग गई है?
आईने से बातें करने की तुम्हें
जो आदत पड़ गई है/
परीशाँ जुल्फों को भी सँवारने
को भी तुम्हें जो फिकर नहीं,
जाने किस पागलपन की तुम्हें
जो सनक मिल गई है/
पहलू में मेरे बैठो न बैठो कम से
कम अपना ख्याल तो करो,
लाजिम नहीं है इस तरह से
खुद को भी भूल जाना/
वो अदा वो नजाकत, मेरे रुबरु
वो तुम्हारा दीवानापन,
कहाँ गया वो तुम्हारा घूँघट खींच
कर अंदर चली जाना/
सोच लो हमें भी आज तुम्हारी
कुछ खास जरूरत पड़ गई है/
जाने आज तुमको ये किसकी
नजर लग गई है/
हम गैर ही सही पर दिल से
तुम्हारे अपने हैं,
चाहते हैं दिल की बात
आँखों से बयां कर देना/
आज खामोश तुम्हारी निगाहों में
नहीं गर कोई नया फसाना,
न उठाएगी जो सर भी गर
बेहतर है हमारा चल देना/
मेरे दिल के आशियाने में आज
आग सी लग गई है/
जाने आज तुमको ये किसकी
नजर लग गई है//
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खुदा से ज्यादा बोलबाला है
इन हसीनों का/
जिसे जी चाहे मारें
जिसे जी चाहे जिलाएँ//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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