मुहब्बत आपसे करता हूँ मगर ( गजल)
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मिलना तो चाहता हूँ आपसे जरूर मगर,
कोशिशे- मुलाकात को आप गरज न समझें/
इल्तजा- ए- मुहब्बत में पहल आपसे हुई है,
मेरी दरख्वास्त है, मेरी तड़प को आप मरज न समझें/
जिन्दगी को मिला है, जो ये टुकड़ा- ए- माहताब,
खुद तलाशा है इसे, आप खुदा- मयस्सर न समझें/
नैरंगियाँ- ए- बहार इश्क में, आप ही तो लाए थे,
हाले- पुरशिस में मेरी, आप कोर-कसर न समझें/
जिन्दगी को ही आपके कदमों पे निछावर कर दिया,
आप मुहब्बत को मेरी, तर्जुमानी- ए- बहस न समझें/
घूम रही है मौत अब तो बरहना- सर, आगे-पीछे,
मैं आपकी सिर्फ रूह हूँ, आप बसर न समझें/
जो भी हुआ, समझ लें इक मोड़ जिन्दगी का,
एक तूफान था सिफत, आप महशर न समझें/
आरजू सिर्फ आपको ही थी, महफिल में मुझको,
किसी और को चाहता हूँ, कोई दिल में वहम न रखें/
सैरे- गुल्शन को गया था, आपको खोजने केवल,
इसे आप हर कली को परखने की वहशत न समझें/
किसी गैर ने जो फूँक दिया जो, दिल का नशेमन मेरा,
इक हादसा ही था, इसे आप रस्मे- दहर न समझें/
अभी तो शबे- बहार बाकी है, और आप पहलू में,
प्याले में है शराब, अभी खिजा की सहर न समझें/
तजरबाते- हयात तबसे जो आपको समझा रहा हूँ,
इल्तजा है, सही आप हरफ- ब- हरफ समझें/
मेरे चेहरे पे जो भोलापन और लबों पे खामोशी है,
जाहिर है निगाहों से, आप बनावट की रंगत न समझें/
मुहब्बत तो आपसे करता हूँ मगर, खुद्दारी नहीं मिटाई
" रतन"
इजहारे- दर्द को मेरे महज आप दिल की कसक न
समझें//
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यूँ तो सबसे मिलता हूँ,
सबसे करता हूँ बात सही,
तुम न मिलो तो,
कोई मुलाकात मुलाकात नहीं/
राजीव रत्नेश
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