जुल्फ लहराओ तो ( कविता)
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ये जुल्फ लहराओ तो कोई बात बने/
आँखों से पिलाओ तो कोई बात बने/
यह दिल की तमन्ना है, आशिक की चाह है,
घूँघट खींच के शरमाओ, तो कोई बात बने/
रात गुजर रही है, तमन्ना निकल रही है,
साँस घुट रही है, चाहत निकल रही है,
दुश्मनी क्यूँ निभा रही हो अब तक,
तुम्हारे इंतजार में ये जान निकल रही है/
मेरे करीब आओ तो कोई बात बने/
मेरे पहलू में आओ तो कोई बात बने/
चमन उदास है, शाम है धुँआ-धुँआ,
हर तरफ सन्नाटा, स्यार बोलते हुँआ-हुँआ,
तुम भी यूँ किनारा करके दूर बैठी हो,
मैं भी कहूँ, कैसे आग लगी, ये क्या हुआ?
मस्त आँखों से पिलाओ, तो कोई बात बने/
ये जुल्फ लहराओ तो कोई बात बने/
हुस्न को इश्क की तारीकियों में खो जाने दो,
रात की बेला को सुनहरी किरनों में खो जाने दो,
बस तुम साजे- दिल पे, वफा का राग छेड़ती रहो,
अन्जाने में जो हो जाए, वो हो जाने दो/
तुम ये चिलमन उठाओ तो कोई बात बने/
ये जुल्फ लहराओ तो कोई बात बने/
सफर चाँद का भी पूरा हो रहा है,
आशिक का जैसे जनाजा निकल रहा है,
तोड़ा होगा किसी लैला ने मजनूँ का दिल,
देखो कैसे मजनूँ का तमाशा निकल रहा है/
जामे- वफा पिलाओ तो कोई बात बने/
ये जुल्फ लहराओ तो कोई बात बने/
मेरी दुनिया से दूर जाओगी भी तो क्या,
हसरतो- तमन्ना मेरी मिटाओगी भी तो क्या,
बहुत चोट खाई है, ये गम भी सह लेंगे,
लोगों को मेरे खत दिखलाओगी भी तो क्या/
तुम ये आँचल बिखराओ तो कोई बात बने/
ये जुल्फ लहराओ तो कोई बात बने/
मेरी खामोश सी दुनिया में है कैसा तहलका?
ये तूने आज क्या किया है, मेरी माहलका?
मैंने तेरी खातिर जान की बाजी भी लगाई,
और तूने आज तक न निभाई कोई वफा/
मेरे दिल में खंजर चुभाओ तो कोई बात बने/
ये जुल्फ लहराओ तो कोई बात बने/
तेरी बोझल आँखों में छलकता नीला सागर,
मेरा प्यार बनता जा रहा है प्रतिपल पागल,
मैं तेरे लिए दिन- ब- दिन घुलता जा रहा हूँ,
और तू सरे- बज्म छनका रही है पायल/
' रतन' पर तेरे सितम का कोई असर हो तो कहे/
ये जुल्फ लहराओ तो कोई बात बने//
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अशआर
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ये क्यूँ नाराजगी इतनी,
किस बात का मलाल है?
हम भी तो कुछ सुनें
तुम्हारे दिल का क्या हाल है?
सुहाना है मंजर
मुस्कराती हैं फिजायें,
क्या बात है कि
आज ये चाँद उदास है?
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कुछ यूँ मीठी सदा से गाना सुनाया आपने,
कुछ यूँ हसरती अदा से दिल लुभाया आपने,
हम तो तन- मन की सुधबुध खो बैठे,
ये किस अदा से प्यार जताया आपने//
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छोड़ दी है तुमसे जो मुहब्बत हमने,
क्यूँ बुझाए हुए हो चिरागे- दिल तुम?
तुम्हारे तो हम जैसे दीवाने बहुत हैं,
फिर रोनी सूरत क्यूँ बनाए हुई हो तुम?
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राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
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